भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 540, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ें५०८ । भैषज्यरत्नावली । [ कासरोग -
पित्तकी खाँसीमें जांगलदेशके जीवोंके मांसरस, मधुर पदार्थ, मूँग आदिका यूष और कडवे शाकादिके साथ-समा जौ और कोदों आदिका अन्न सेवन करना चाहिये ॥ ६ ॥
द्राक्षामधुरखर्जूरं पिप्पलीमरिचान्वितम् । पित्तकासहरं ह्येतल्लिह्यान्माक्षिकसर्पिषा ॥ ७ ॥
दाख, मुलहठी, खजूर, पीपल और मिरच इनके समान भाग मिश्रित चूर्णको घी और शहदके साथ सेवन करनेसे पित्तकी खाँसी दूर होती है ॥ ७ ॥
बलिनं वमनेनादौ शोधित कफकासिनम् । यवान्नैः कटुरूक्षोष्णैः कफघ्नैश्चाप्युपाचरेत् ॥ ८ ॥
कफकी खाँसीवाले बलवान् रोगीको प्रथम वमनके द्वारा शुद्ध करके कफनाशक कटु रूक्ष और उष्ण पदार्थोंके साथ जौका माँड आदि सेवन कराना ॥ ८ ॥
पार्श्वशूले ज्वरे श्वासे कासे श्लेष्मसमुद्भवे । पिप्पलीचूर्णसंयुक्तं दशमूलीजलं पिबेत् ॥ ९ ॥
पार्श्वशूल, ज्वर, श्वास और कफजनित खाँसीमें-पीपलका चूर्ण मिलाकर दशमूलका क्वाथ पान करना चाहिये ॥ ९ ॥
स्वरसं शृङ्गवेरस्य माक्षिकेण समन्वितम् । पाययेच्छ्वासकासघ्नं प्रतिश्यायकफापहम् ॥ १० ॥
अदरखके स्वरसको शहदके साथ मिलाकर पान करानेसे श्वास, खाँसी, जुकाम और कफके सब विकार नष्ट होते हैं ॥ १० ॥
कण्टकारीकृतः क्वाथः सकृष्णः सर्वकासनुत् ।
पीपलके चूर्णसहित कटेरीके क्वाथको पीनेसे सर्व प्रकारकी खाँसी दूर होती है॥
विभीतकं घृताभ्यक्तं गोशकृत्परिवेष्टितम् । स्विन्नमग्नौ हरेत्कासं ध्रुवमास्यविधारितम् ॥ ११ ॥
बहेडेको घीमें सानकर फिर गौके गोबरमें लपेटकर उसको अग्निमें पकावे पश्चात् उसकी गुठलीको निकालकर बहेडेको मुखमें धारण करनेसे खाँसी शान्त होती है ११
वासकस्य रसः पेयो मधुयुक्तो हिताशिना । पित्तश्लेष्मकृते कासे रक्तपित्ते विशेषतः ॥ १२ ॥