भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५०९
पित्तकी और कफकी खाँसीमें एवं विशेषकर रक्तपित्तमें अडूसेके पत्तोंके स्वर- सको शहद मिलाकर सेवन करने और हितकर पदार्थोंको भक्षण करनेसे लाभ होता है ॥ १२ ॥
वासायाः स्वरसं पूतं कणामाक्षिकसंयुतम् । अभ्यासान्मुच्यते पीत्वाप्यसाध्यात्कासरोगतः ॥ १३ ॥
अडूसेके पत्तोंके शुद्ध स्वरसमें पीपलका चूर्ण और शहद मिलाकर प्रतिदिन पान करनेसे असाध्य कासरोग दूर होता है ॥ १३ ॥
समूलं चित्रकं चैव पिप्पलीचूर्णं हरेत् । कासं श्वासं च हिक्कां च मधुयुक्तं द्विजोत्तम ॥ १४ ॥
चीतेकी जड और पीपलके समान भाग चूर्णको शहदके साथ मिलाकर सेवन करनेसे खाँसी, श्वास और हिचकी दूर होती है ॥ १४ ॥
तद्वत् क्रव्यादाजं मांसं कौलिङ्गं मांसमेव च । असाध्यान्मुच्यते भुक्त्वा कासाद्भ्यासयोगतः ॥ १५ ॥
श्येन आदि मांसाहारी पक्षियों और चिंडे आदिके मांस रसको नियमपूर्वक सेवन करनेसे असाध्य कास (खाँसी) रोग दूर होता है ॥ १५ ॥
मुस्तकं पिप्पली द्राक्षा सुपक्वं बृहतीफलम् । घृतक्षौद्रयुतो लेहः क्षयकासनिबर्हणः ॥ १६ ॥
नागरमोथा, पीपल, दाख और पके हुए बडी कटेरीके फल इनके समान भाग चूर्णको घृत और शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे क्षयकी खाँसी नष्ट होती है ॥ १६ ॥
तिन्तिडीपत्रजः क्वाथो हिङ्गुसैन्धवसंयुतः । दुष्टकासं जयत्याशु तृणवृन्दमिवानलः ॥ १७ ॥
इमलीके पत्तोंके क्वाथमें हींग और सैंधानमक डालकर पान करनेसे दारुण खाँसी इस प्रकार शीघ्र नाश होजाती है, जैसे अग्निके द्वारा तृणसमूह ॥ १७ ॥
मरिचशिलाकक्षीरैर्वार्त्ताकीं त्वचमाशु भाविताम् । शुष्कां कृत्वा विधिना धूमं पिबतः कासाः शमं यांति ॥ १८
कालीमिर्च, मैनशिल और आकके दूधके द्वारा कटेरीको विधिपूर्वक भावना देकर सुखाकर उसका धूम्रपान करनेसे खाँसी शमन होती है ॥ १८ ॥
पञ्चमूलीक्वाथ । निहन्ति कासं गुरुपञ्चमूलीकृतः कषायो मगधासहायः ॥