भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५१३
ताँबा, अभ्रक और कान्तसारलोह इन तीनोंकी भस्म समान भाग लेकर कसोंदीकी छालके रस, अगस्तके रस और अमलवेतके रसके साथ एक दिनतक खरल करके दो दो मासेकी गोलियाँ बनालेवे । पित्तकी खाँसीवाला रोगी तीन दिनतक इसकी एक एक गोली सेवन करे । इससे पित्तकी खाँसी, श्वास, अग्निमान्द्य और क्षयादि सब रोग शीघ्र नष्ट होते हैं ॥ ३४ ॥ ३५ ॥
पुरन्दरवटी ।
सूतकाद्विगुणं गन्धमेकधा कज्जलीकृतम् ।
त्रिकटुत्रिफलाचूर्णं प्रत्येकं सूतसम्मितम् ॥ ३६ ॥
अजाक्षीरेण सम्भाव्य वटिकां कारयेत्ततः ।
आर्द्रकस्य रसैः सेव्या शीतं तोयं पिबेदनु ॥ ३७ ॥
कासश्वासप्रशमनी विशेषादग्निवर्द्धनी ।
इयं यदि सदा सेव्या तदा स्याद्योगवाहिका ॥
वृद्धोऽपि तरुणः शक्तः स्त्रीशतेषु वृषायते ॥ ३८ ॥
शुद्ध पारा १ तोला और शुद्ध गन्धक दो तोले लेकर दोनोंकी एकत्र कज्जली करलेवे, फिर सोंठ, मिरच, पीपल, हरड, बहेडा, आमला—ये प्रत्येक एक एक तोला मिलाकर बकरीके दूधके साथ खरल करके एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे एक गोली अदरकके रसके साथ खाकर ऊपरसे शीतल जल पान करनेसे यह गोली खाँसी और श्वासको दूर करती है और विशेषकर अग्निवृद्धि करती है । यदि इसको सदैव सेवन कियाजाय तो यह योगवाही होजाती है । इसके प्रसादसे, वृद्ध मनुष्यभी तरुण होजाता है और सैकड़ों स्त्रियोंके साथ रमण करनेको समर्थ होता है ॥ ॥ ३६-३८ ॥
पञ्चामृतरस ।
शुद्धसूतस्य भागैकं भागौ द्वौ गन्धकस्य च ।
भागद्वयं मृतं ताम्रं मरिचं दशभागिकम् ॥ ३९ ॥
मृताभ्रस्य चतुर्भागं भागमेकं विषं क्षिपेत् ।
अम्लेन मर्दयेत्सर्वं माषैकं वातकासनुत् ॥
अनुपानं लिहेत्क्षौद्रैर्विभीतकफलत्वचम् ॥ ४० ॥
शुद्ध पारा १ तोला, शुद्ध गन्धक २ तोले, ताम्रभस्म २ तोले, मिरच १० तोले, अभ्रकभस्म ४ तोले और शुद्ध मीठा तेलिया १ तोला इन सबको एकत्र मिलाकर
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