भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 546
५१४भैषज्यरत्नावली ।[ कासरोग-

जम्बीरी निम्बूके रसमें खरल करके उड़दकी बराबर गोलियाँ बनालेवे। नित्यप्रति प्रातःसमय एक एक गोली बहेड़ेकी छालके चूर्ण और शहदके साथ मिलाकर खानेसे वातज खाँसी नष्ट होती है ॥ ३९ ॥ ४० ॥

अमृतार्णवरस ।

पारदं गन्धकं शुद्धं मृतलौहं च टङ्कणम् ।
रास्ना विडङ्गं त्रिफला देवदारु कटुत्रिकम् ॥ ४१ ॥
अमृता पद्मकं क्षौद्रं विषं चापि विचूर्णयेत् ।
द्विगुञ्जं वातकासार्त्तः सेवयेदमृतार्णवम् ॥ ४२ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लोहभस्म, सुहागा, रास्ना, वायविडङ्ग, त्रिफला, देवदारु, सोंठ, मिरच, पीपल, गिलोय, पद्माख और शुद्ध मीठा तेलिया इन सबको समान भाग लेकर एकत्र चूर्णकर लेवे। इस अमृतार्णवरसको दो दो रत्तीकी मात्रासे शहदके साथ मिलाकर सेवन करनेसे वातकी खाँसी दूर होती है ॥ ४१ ॥ ४२ ॥

श्रीचन्द्रामृतरस ।

रसगन्धकलौहानां प्रत्येकं कार्षिकं शुभम् ।
टङ्कणस्य पलं दत्त्वा मरिचस्य पलार्द्धकम् ॥ ४३ ॥
त्रिकटु त्रिफला चव्यं धान्यजीरकसैन्धवम् ।
प्रत्येकं तोलकं ग्राह्यं छागीक्षीरेण पेषयेत् ॥ ४४ ॥
नवगुञ्जाप्रमाणेन वटिकां कारयेद्भिषक् ।
प्रातःकाले शुचिर्भूत्वा चिन्तयित्वाऽमृतेश्वरीम् ॥ ४५ ॥
एकैकां वटिकां खादेद्रक्तोत्पलरसप्लुताम् ।
नीलोत्पलरसेनापि कुलत्थस्थ रसेन वा ॥
पिप्पल्या मधुना वापि शृङ्गवेररसेन वा ॥ ४६ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक और लोहभस्म ये प्रत्येक एक एक कर्ष, सुहागा ४ तोले, मिरच २ तोले, त्रिकुटा, त्रिफला, चव्य, धनिया, जीरा और सैंधानमक ये प्रत्येक एक एक तोला लेवे। सबको एकत्र बकरीके दूधके साथ खरल करके नौ नौ रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। प्रतिदिन प्रातःकाल पवित्र होकर अमृतेश्वरीका ध्यान करके एक एक गोली सेवन करे और लालकमल, नीलकमल, कुलथी वा अदरखके