भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५१५

रस और शहदका अनुपान करे। अथवा पीपलके चूर्णको शहद मिलाकर चाटे॥४३-४६

हन्ति पञ्चविधं कासं वातपित्तसमुद्भवम् । वातश्लेष्मोद्भवं दोषं पित्तश्लेष्मोद्भवं तथा ॥ ४७ ॥ वातिकं पैत्तिकं चैव नानादोषसमुद्भवम् । रक्तनिष्ठीवनं चापि ज्वरं श्वाससमन्वितम् ॥ ४८ ॥ तृष्णां दाहं भ्रमं हन्ति जठराग्निप्रदीपनम् । बलवर्णकरो ह्येष प्लीहगुल्मोदरापहः ॥ ४९ ॥ आनाहकृमिहृत्पाण्डुजीर्णज्वरविनाशनः । अयं चन्द्रामृतो नाम चन्द्रनाथेन निर्मितः ॥ ५० ॥ वासा गुडूची भार्गी च मुस्तकं कण्टकारिका । सेवानन्ते प्रकर्त्तव्या रसोऽयं वीर्यवर्द्धनः ॥ ५१ ॥

यह श्रीचन्द्रामृतनामक रस वातपित्तजन्य व वातकफोत्पन्न और पित्तकफजनित तथा वातिक, पैत्तिक आदि पाँचोंप्रकारकी खाँसी एवं अन्यान्य विविध प्रकारके दोषोंसे उत्पन्नहुई खाँसीको दूर करता है । एवं इसके सेवन करनेसे रुधिरकी वमन, श्वासयुक्त ज्वर, श्वास, तृषा, दाह, भ्रमादिरोग दूर होते हैं और जठराग्नि दीपन होती है । यह रस बल, वर्णकी वृद्धि करता एवं प्लीहा, गुल्म, उदरविकार, आनाह, कृमिरोग, हृदयरोग, पाण्डु और जीर्णज्वरादि व्याधियोंको शमन करता है । इस चन्द्रामृतरसको श्रीचन्द्रनाथने निर्माण किया है । इसको सेवन करनेके पश्चात् अडूसेकी छाल, गिलोय, भारंगी, नागरमोथा और कटेरीका क्वाथ पान करनेसे यह रस वीर्यकी वृद्धि करता है ॥ ४७-५१ ॥

श्रीडामरानन्दाभ्रक ।

अभ्रस्यामलमारितस्य तु पलं क्षुद्राटरूषस्थिरा- बिल्वश्योऽल्लुपाटलाकलसिकाः सब्रह्मयष्ट्यार्द्रकाः । चित्रग्रन्थिकगोक्षुरं सचविकं भार्ङ्ग्यात्मगुप्तान्वितं सत्त्वैर्मर्दितमेकशश्च पलिकैर्गुञ्जाद्र्धिकं भक्षितम् ॥ ५२ ॥ कासं पञ्चविधं स्वरामयमुरोघातं च हिक्कां ज्वरं श्वासं पीनसमेहगुल्ममरुचिं यक्ष्माम्लपित्तं क्षयम् ।