भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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५३०भैषज्यरत्नावली ।[ कासरोग -

क्षिपेच्चतुर्जातपलं यथाग्नि प्रयुज्यमानो विधिनाऽवलेहः ।
वातात्मकं पित्तकफोद्भवं च द्विदोषकासानपि च त्रिदोषम् ॥४१
क्षयोद्भवं च क्षतजं च हन्यात्सपीनसश्वासमुरःक्षतं च ।
यक्ष्मागमेकादशमुग्ररूपं भृगूपदिष्टं हि रसायनं स्यात् ॥४२॥

जड, फूल और पत्तोंसहित कटेरी १०० पल और हरड १०० पल लेकर एक द्रोण जलमें डालकर पकावे । जब पककर चौथाई जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे और हरडोंकी गुठली निकाल डाले फिर उस क्वाथमें उक्त हरडे और पुराना गुड १०० पल डालकर पकावे । जब पाक तैयार हो जाय तब नीचे उतार-कर शीतल होनेपर उसमें त्रिकुटा ९ तोले, शहद २४ तोले और दारचीनी, तेजपात, इलायची, नागकेशर इनका चूर्ण चार चार तोले मिलाकर सबको एकमएक कर-लेवे । इस अवलेहको अपनी अग्निका बलाबल विचारकर सेवन करे तो यह हरीतकी वातज, पित्तज, कफज द्वन्द्वज और त्रिदोषज खाँसी, क्षयकी खाँसी और क्षतकी खाँसी तथा पीनस, श्वास, उरः-क्षत और ग्यारह प्रकारके प्रवल राजयक्ष्माको नष्ट करती है । यह भृगुजीकी निर्दिष्ट की हुई रसायन है ॥ १३९-१४२ ॥

वासावलेह ।

वासकस्वरसप्रस्थे मानिका सितशर्करा ।
पिप्पली द्विपलं दत्त्वा सर्पिषश्च पचेच्छनैः ॥ ४३ ॥
लेहीभूते ततः पश्चाच्छीते क्षौद्रपलाष्टकम् ।
दत्त्वाऽवतारयेद्वैद्यो मात्रया लेह उत्तमः ॥ ४४ ॥
निहन्ति राजयक्ष्माणं कासं श्वासं च दारुणम् ।
पार्श्वशूलं च हृच्छूलं रक्तपित्त ज्वरं तथा ॥ ४५ ॥

अड़ूसेके दो सेर स्वरसमें एक सेर सफेद खाँड डालकर मन्द मन्द अग्निके द्वारा धीरे धीरे पकावे । जब पकते पकते लेहकी समान होजाय तब नीचे उतारकर पीपलका चूर्ण ८ तोले, घी ८ तोले और शीतल होनेपर शहद ३२ तोले मिलाकर एक चिकने बर्त्तनमें भरकर रखदेवे । इस अवलेहको यथोचित मात्रासे सेवन करे । यह राजयक्ष्मा, खाँसी, दारुण श्वास, पसलीका शूल, हृदयका शूल, रक्तपित्त और ज्वरको नष्ट करनेवाली अत्युत्तम औषधि है ॥ ४६-४७ ॥