भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 561, कुल 1416 में से

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५२९


यह रस—बहुत दिनोंकी पुरानी पाँचों प्रकारकी खाँसी, अत्यन्त भयङ्कर राज- यक्ष्मा, जीर्णज्वर, अरुचि, धातुगतज्वर, विषमज्वर, तिजारी, चौथिया ज्वर, अर्श, कामला, पाण्डुरोग, मन्दाग्नि और प्रमेहरोगको शीघ्र नष्ट करता है। इसके सेवनसे मनुष्य कामदेवकी समान रूपवान् होजाता है ॥ ३५-३६ ॥

वसन्ततिलक रस।

हेम्नो भस्मकतोलकं घनयुगं लौहात्त्रयः पारदा- श्चत्वारो नियतास्तु वङ्गयुगलं चैकीकृतं मर्दयेत् । मुक्ताविद्रुमयो रसेन समता गोक्षूरवासेक्षुणा सर्वं वालुकायन्त्रगं परिपचेद्याम दृढं सप्तकम् ॥ ३७ ॥ कस्तूरीघनसारमर्दितरसः पश्चात्सुसिद्धो भवेत् कासश्वाससपित्तवातकफजित्पाण्डुक्षयादीन् हरेत् । शूलादिग्रहणीं विषादिहरणो मेहाश्मरीविंशतिं हृद्रोगापहरो ज्वरादिशमनो वृष्यो वयोवर्द्धनः ॥ "श्रेष्ठः पुष्टिकरो वसन्ततिलको मृत्युञ्जयेनोदितः" ३८

सोनेकी भस्म १ तोला, अभ्रककी भस्म २ तोले, लोहेकी भस्म ३ तोले, शुद्ध पारा ४ तोले, शुद्ध गन्धक ४ तोले, वंगभस्म २ तोले, मोतीकी भस्म दो तोले और मूँगेकी भस्म २ तोले इन सबको एकत्र पीसकर गोखरू, अडूसा और ईखके समान भाग रसमें एक एक बार भावना देवे । फिर वालुकायन्त्रमें रखकर आरने उपलोंकी अग्निके द्वारा सात प्रहरतक पकावे । जब शीतल हो जाय तब उसमें कस्तूरी ४ तोले और भीमसेनी कपूर ४ तोले खरल कर मिलादेवे । इस प्रकार यह रस सिद्ध होता है । यह रस दो दो रत्ती प्रमाण सेवन करनेसे खाँसी, श्वास, वात, पित्त, कफके विकार, पाण्डु, क्षय, शूल, संग्रहणी, विषजन्य रोग, प्रमेह, हृदयरोग और और सर्व प्रकारके ज्वरादि रोगोंको हरता है । एवं पुष्टिकारक, वीर्य और आयुकी वृद्धि करनेवाला तथा अत्यन्त श्रेष्ठ रस है । इस वसन्ततिलक नामक रसको शिव- जीने वर्णन किया है ॥ ३७-३८ ॥

व्याघ्रीहरीतकी ।

समूलपुष्पच्छदकण्टकार्यास्तुलां जलद्रोणपरिप्लुतां च । हरीतकीनां च शतं निदध्याद्विपच्य सम्यक्चरणावशेषम् ३९ गुडस्य दत्त्वा शतमेतदग्नौ विपक्वमुत्तीर्य ततः सुशीते । कटुत्रिकं च द्विदलप्रमाणं पलानि षट् पुष्परसस्य तत्र ॥४०

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