भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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५३४ | भैषज्यरत्नावली | [ कासरोग-

काकोली, क्षीरकाकोली, ऋद्धि वृद्धि, मुगवन, मषवन, जीवन्ती और मुलहठी ) की ओषधियाँ, नागरमोथा, लौंग, केशर, वच, नीलकमल, खिरैंटी, त्रिकुटा, पिठवन, रेणुका, वाराहीकन्द, गिलोय, फूलप्रियंगु, एलुआ, छोटी और बडी इलायची, वंशलोचन, आमले, मालतीके फूल, हाऊबेर, चव्य, तेजपात, तालीशपत्र, नागकेशर असगन्ध, जीरा और अजवायन ये प्रत्येक दो दो तोले डालकर मन्द मन्द अग्निके द्वारा घृतको पकावे । यह कुंकुमाद्यघृत अत्यन्त भयंकर राजयक्ष्मा, खाँसी, श्वास क्षय, ज्वर रक्तपित्त और प्रमेहरोगको नष्ट करता है ॥ १६२-१६८ ॥

चन्दनाद्यतैल ।

चन्दनागुरुतालीशमञ्जिष्ठानखपद्मकम् ।
मुस्तकं च शठी लाक्षा हरिद्रे रक्तचन्दनम् ॥ ६९ ॥
एषां प्रतिपलैश्चूर्णैस्तैलार्द्धं पात्रकं पचेत् ।
भार्ङ्गीवासाकण्टकारीवात्यालकगुडूचिकाः ॥ ७० ॥
एषां शतपले क्वाथे समभागे जडीकृते ।
पक्त्वा तैलं प्रदातव्यं राजयक्ष्मविनाशनम् ॥ ७१ ॥
कासघ्नं गलदोषघ्नं बलवर्णाग्निवर्द्धनम् ।
पापालक्ष्मीप्रशमनं ग्रहदोषविनाशनम् ॥ ७२ ॥

चन्दन, अगर, तालीशपत्र, मंजीठ, नख, पद्मनख, नागरमोथा, कचूर, लाख हल्दी, दारुहल्दी, लालचन्दन इन सबको चार चार तोले लेकर चूर्ण करलेवे । फिर भारंगी, अडूसेकी छाल, कटेरी, खिरैंटी और गिलोय इन सबके समान भाग मिश्रित १०० पल क्वाथमें उक्त चूर्ण और चार सेर तिलका तैल डालकर यथाविधि तैलको सिद्ध करे । यह तैल राजयक्ष्मा, खाँसी और गलेके सम्पूर्ण दोषोंको नष्ट करता है और बल, वर्ण, जठराग्निकी वृद्धि करता है । पाप, दारिद्र्य और समस्त ग्रहदोषोंको दूर करता है ॥ १६९-१७२ ॥

वासा-चन्दनाद्य तैल ।

चन्दनं रेणुका पूतिर्हयगन्धा प्रसारिणी ।
त्रिसुगन्धिकणामूलं नागकेशरमेव च ॥ ७३ ॥
मेदे द्वे च त्रिकटुकं रास्ना मधुकशैलजम् ।
शठी कुष्ठं देवदारु वनिता च विभीतकम् ॥ ७४ ॥