भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५३५

एतेषां पलिकैर्भागैः पचेत्तैलाढकं भिषक् ।
वासायाश्च पलशतं जलद्रोणे विपाचयेत् ॥ ७५ ॥
लाक्षारसाढकं चैव तथैव दधिमस्तुकम् ।
चन्दनं चामृता भार्गी दशमूलं निदिग्धिका ॥ ७६ ॥
एतेषां विंशतिपलं जलद्रोणे विपाचयेत् ।
पादशेषे स्थिते क्वाथे तैलं तेनैव साधयेत् ॥ ७७ ॥

अडूसेकी छाल १०० पल एवं लाल चन्दन, गिलोय, भारङ्गी, दशमूल और कटेरी इन प्रत्येकको बीस बीस पल लेकर पृथक् पृथक् एक एक द्रोण जलमें पकावे। जब पकते-पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे। फिर सबको एकत्र मिलाकर उसमें लाखका रस एक आढक, दहीका तोड १ आढक, तिलका तैल ८ सेर और चन्दन, रेणुका, रोहिषतृण, असगन्ध, प्रसारणी, दार-चीनी, छोटी इलायची, तेजपात, पीपलामूल, नागकेशर, मेदा, महामेदा, त्रिकुटा, रायसन, मुलहठी, भूरिछगीला, कचूर, कूठ, देवदारु, प्रियंगु और बहेडा इन प्रत्ये-कका चार चार तोले चूर्ण डालकर मन्द मन्द अग्निसे तैलको पकावे ॥ ७३-७७ ॥

कासान् ज्वरान् रक्तपित्तं पाण्डुरोगं हलीमकम् ।
कामलां च क्षतक्षीणं राजयक्ष्माणमेव च ॥ ७८ ॥
श्वासान्पञ्चविधान् हन्ति बलवर्णाग्निपुष्टिकृत् ।
तैलं चन्दनवासादि कृष्णात्रेयेण भाषितम् ॥ ७९ ॥

यह वासा-चन्दनादि तैल मालिश करनेसे सर्व प्रकारकी खाँसी, ज्वर, रक्त-पित्त, पाण्डु, हलीमक कामला, क्षतक्षीण, राजयक्ष्मा और पाँच प्रकारके श्वासदोगको नष्ट करता है। बल, वर्ण और जठराग्निकी वृद्धि एवं पुष्टि करता है ॥ ७८ ॥ ७९ ॥

कासरोगमें पथ्य ।

स्वेदो विरेचनं छर्दिर्धूमपानं समाशनम् ।
शालिषष्टिकगोधूमश्यामाकयवकोद्रवाः ॥ १८० ॥
आत्मगुप्तामाषमुद्गकुलत्थानां रसाः पृथक् ।
ग्राम्यौदकानूपधन्वमांसानि विविधानि च ॥ ८१ ॥
सुरा पुरातनं सर्पिश्छागं चापि पयोश्श्रुतम् ।
वास्तुकं वायसीशाकं वार्त्ताकूवालमूलकम् ॥ ८२ ॥