भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 568
५३६भैषज्यरत्नावली ।[ कासरोग-

कण्टकारी कासमर्दो जीवन्ती सुनिषण्णकम् ।
द्राक्षा बिम्बी मातुलुङ्गं पौष्करं वासकस्त्रुटिः ॥ ८३ ॥
गोमूत्रं लशुनं पथ्या व्योषमुष्णोदकं मधु ।
लाजा दिवसनिद्रा च लघून्यन्नानि यानि च ।
पथ्यमेतद्यथादोषमुक्तं कासगदातुरे ॥ ८४ ॥

स्वेद देना, विरेचन, वमन और धूम्रपान कराना, परिमित आहार-विहार करना, शालिधान और साँठी धानोंके चावल, गेहूँ, समेके चावल, जौ, कोदों, कौंचके बीज, उड़दोंका यूष, मूँगका यूष और कुलथीका यूष, ग्राममें होनेवाले पशु-पक्षी, जलचर जीव, अनूपदेश जात पशु-पक्षियोंका और मरुदेशोत्पन्न विविध प्रकारके जीवोंका मांस, मदिरा, पुराना घी, बकरीका दूध, घी, बथुएका शाक, मकोय, बैंगन, कच्ची मूली इनका शाक, कटेरी, परवल, जीवन्ती, चौपतियाका शाक, दाख, कन्दूरी, बिजौरा नींबू, पोहकरमूल, अडूसा, छोटी इलायची, गौका मूत्र, लहसुन, हरड, सोंठ, मिरच, पीपल, उष्णजल, शहद, खीलें, दिनमें सोना और हल्के अन्नोंका भोजन ये सब पदार्थ यथा दोषानुसार कासरोगमें हितकर कहे गये हैं ॥ १८०-८४ ॥

कासरोगमें-अपथ्य ।

बस्तिं नस्यमसृङ्मोक्षं व्यायामं दन्तघर्षणम् ।
विष्टम्भीनि विदाहीनि रूक्षाणि विविधानि च ॥ ८५ ॥
शकृन्मूत्रोद्गारकासवमिवेगविधारणम् ।
आतपं दुष्टपवनं रजोमार्गानिषेवणम् ॥ ८६ ॥
मत्स्यं कन्दं सर्षपं च तुम्बीफलमुपोदिकाम् ।
दुष्टाम्बु चान्नपानं च विरुद्धान्यशनानि च ॥
गुरु शीतं चान्नपानं कासरोगी परित्यजेत् ॥ १८७ ॥

वस्तिक्रिया, नस्य, रक्तमोक्ष (रुधिरका निकलवाना), कसरत, दन्तधावन, विष्टम्भकारक पदार्थ, दाहकारक और अनेकप्रकारके रूखे पदार्थोंका सेवन, मल, मूत्र, डबकाई, खाँसी और वमनके वेगोंको रोकना, धूप, दूषित वायु और धूलका सेवन, मार्ग चलना, मछली, कन्दशाक, सरसों, लौकी, पोईकी शाक, दूषित जल और विरुद्ध अन्नपान एवं भारी और शीतल अन्नपान ये सब कासरोगवालेको त्याग देने चाहिये ॥ १८५-१८७ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां कासरोगचिकित्सा ।