भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५४० भैषज्यरत्नावली । [ हिक्काश्वास-
शुद्ध गन्धकके चूर्ण और मिरचोंके चूर्णको घृतके साथ अथवा केवल शुद्ध गन्ध- कके ही चूर्णको घृतके साथ मिलाकर सेवन करनेसे श्वास, खाँसी और क्षयरोग दूर होता है ॥ १९ ॥
दशमूलादि ।
पिप्पलीचूर्णसंयुक्तं दशमूलीजलं पिबेत् ।
पार्श्वशूलज्वरश्वासकासश्लेष्म विनाशयेत् ॥ २० ॥
दशमूलके क्वाथमें पीपलका चूर्ण मिलाकर पान करनेसे पार्श्वशूल, ज्वर, श्वास, खाँसी और कफविकार नष्ट होते हैं ॥ २० ॥
शठ्यादि ।
शठीदशमूलीरास्नापिप्पलीविश्वपौष्करैः ।
शृङ्गीत्वामलकीभार्गीगुडूचीनागराग्निभिः ॥ २१ ॥
विधिवत्सेव्यमाने तु कषायं वा पिबेन्नरः ।
श्वासहृद्ग्रहपार्श्वार्त्तिहिक्काकासप्रशान्तये ॥ २२ ॥
कचूर, दशमूलकी सब ओषधियाँ, रायसन, पीपल, सोंठ, पोहकरमूल, काकडा- सिंगी, भुईआमला, भारङ्गी, गिलोय, सोंठ और चीता इन सब ओषधियोंका विधिपूर्वक क्वाथ बनाकर अथवा इनका चूर्ण बनाकर सेवन करनेसे श्वास, हृदयरोग पार्श्वशूल-हिचकी और खाँसी ये सब रोग शान्त होते हैं ॥ २१ ॥ २२ ॥
वासादि क्वाथ ।
वासा हरिद्रा मगधा गुडूची भार्गीघनानागरधावनीनाम् ।
क्वाथेन मारीचरजोन्वितेन श्वासः शमं याति न कस्य पुंसः २३
अडूसा, हल्दी, पीपल, गिलोय, भारङ्गी, नागरमोथा, सोंठ और कटेरी इनके क्वाथके साथ मिरचोंका चूर्ण मिलाकर पान करनेसे सब प्रकारका श्वास शमन होता है ॥ २३ ॥
शुण्ठीभार्गी क्वाथ ।
शुण्ठीभार्गीकृतः क्वाथः कसनश्वसनाहिराट् ॥ २४ ॥
सोंठ और भारंगीका काढा बनाकर पान करनेसे खाँसी और श्वास रोग दूर होता है ॥ २४ ॥
– हरिद्रादिचूर्ण ।
हरिद्रां मरिचं द्राक्षां गुडं रास्नां कणां शठीम् ।
जह्यात्तैलेन विलिहन् श्वासान्प्राणहरानपि ॥ २५ ॥