भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५३९
हरड और सोंठका चूर्ण अथवा पोहकरमूल, जवाखार और कालीमिरचोंके चूर्णको एकत्र मिलाकर गरम जलके साथ पान करनेसे श्वास और हिक्कारोग शान्त होता है ॥ १३ ॥
कर्षं कलिफलचूर्णं लीढं चात्यन्तमिश्रितं मधुना । अचिराद्धरति श्वासं प्रबलामुर्ध्वगतहिक्कां च ॥ १४ ॥
बहेडेके एक कर्ष परिमाण चूर्णको शहदके साथ उत्तम प्रकारसे मिलाकर सेवन करनेसे श्वास और अत्यन्त प्रबल ऊर्ध्वगत हिक्कारोग बहुत शीघ्र दूर होता ह १४
गुडं कटुकतैलेन मिश्रयित्वा समं लिहेत् । त्रिसप्ताहप्रयोगेण श्वासं निर्मूलतो जयेत् ॥ १५ ॥
पुराने गुड और सरसोंके तैलको समान भाग लेकर एकत्र मिश्रित करके २१ दिनतक सेवन करनेसे श्वास रोग समूल नष्ट होता है ॥ १५ ॥
बिल्वाटरूषदलवारिसमूलशुक्ल- दण्डोत्पलोत्पलजलं कटुतैलमिश्रम् । भार्ङ्गी गुडो यदि च तत्र हतप्रभाव- स्तं श्वासमाशु विनिहन्ति महाप्रभावम् ॥ १६ ॥
बेलके पत्तोंका रस, अडूसेके पत्तोंका रस, मूलसहित सफेद दण्डोत्पलके पत्तोंका रस और कमलके पत्तोंका रस सरसोंके तैलके साथ मिलाकर पान करे । जहाँपर भार्ङ्गीगुडका प्रभाव भी नष्ट होजाता है, ऐसे अत्यन्त प्रबल श्वास रोगको यह ओषधि शीघ्र नष्ट करती है ॥ १६ ॥
कूष्माण्डकानां चूर्णं तु पेयं कोष्णेन वारिणा । शीघ्रं प्रशमयेच्छ्वासं कासं चैव सुदारुणम् ॥ १७ ॥
पेठेके चूर्णको मन्दोष्ण जलके साथ सेवन करनेसे दारुण श्वास और कास रोग शीघ्र शमन होता है ॥ १७ ॥
कृष्णासैन्धवचूर्णं स्वरसेन हि शृङ्गवेरस्य । यो लेढि शयनकाले स जयति सप्ताहतः श्वासम् ॥ १८ ॥
पीपल और सैंधानमकके चूर्णको अदरखके स्वरसके साथ मिलाकर रात्रिमें शयन करते समय सेवन करनेसे सात दिनमेंही श्वास रोग दूर होता है ॥ १८ ॥
गन्धकं मरिचं साज्य श्वासकासक्षयापहम् । गन्धकं घृतयोगेन श्वासकासक्षयापहम् ॥ १९ ॥