भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५५५
दग्धसिक्तमृदाघ्राणं कूर्चे धाराजलार्पणम् ।
नाभ्यूर्ध्वंघातनं दाहो दीपदग्धहरिद्रया ॥
पादयोर्द्व्यङ्गुलात्नाभेरूर्ध्वं चेष्टानि हिक्किनाम् ॥१८ ॥
स्वेदक्रिया, वमन, नस्य, धूमपान, विरेचन आदि क्रियायें, निद्रा, स्निग्ध और हल्के अन्न, खट्टे और मृदु पदार्थ, सेंधानमक, पुरानी कुलथी, गेहूँ, शालि और साँठी धानोंके चावल, जौ आदि अन्न, काले हिरनका मांस, तीतर, लवा और जांगलदेशके पशु-पक्षियोंका मांस, एवं पकाहुआ कैथ, लहसुन, परवल और कच्ची मूली इनका शाक, पोहकरमूल, कालीतुलसी, मद्य, नीम, गरम जल, बिजौरे नींबूका रस, शहद गोमूत्र और वात-कफनाशक अन्नपान, शीतल जलका सेचन, अकस्मात त्रास, विस्मय, भय, क्रोध, और हर्षको उत्पन्न करनेवाले कामोंको करना, प्रियजनके वियोगके कारण उत्पन्नहुआ उद्वेग और प्राणायाम, जलीहुई मिट्टीपर जल छिड़ककर सूंघना, जलमें भिगोकर उसको सूंघना, नाभिके ऊपर दबाना, नाभिसे दो अंगुल ऊपर और दोनों पैरोंके दो अंगुल दीपकके द्वारा जलाईहुई हल्दीसे दाह देना ये सम्पूर्ण क्रियायें हिक्कारोगियोंको हितकर हैं ॥ १३–१८ ॥
हिक्कारोगमें अपथ्य ।
वातमूत्रोद्गारकासशकृद्वेग विधारणम् ।
रजोनिलातपायासान् विरुद्धान्यशनानि च ॥ १९ ॥
विष्टम्भानि विदाहीनि रूक्षाणि कफदानि च ।
निष्पावं पिष्टकं माषं पिण्याकानूपजामिषम् ॥ २० ॥
अवीदुग्धं दन्तकाष्ठं वस्तिं मत्स्यांश्च सर्षपान् ।
अम्लं तुम्बीफलं कन्द तैलाभृष्टमुपोदिकाम् ।
गुरु शीतं चान्नपानं हिक्कारोगी विवर्जयेत् ॥ २१ ॥
अपानवायु, मूत्र, डकार, खाँसी और मलके वेगको रोकना, धूल, वायु और धूपका सेवन, परिश्रम, विरुद्ध भोजन, विष्टम्भी (विबन्धकारी), दाहकारक, रूखे और कफकारक पदार्थ, सेमकी फली, पिंठी, उड़द, पिण्याक (तिलकलक), अनूपदेशोत्पन्न जीवोंका मांस, भेडका दूध, दतौन, वस्तिकर्म, मछली, सरसों, अम्लपदार्थ, लौकी, कन्द शाक, (आलू घुइया, जिमीकन्द आदि), तैलमें भुनेहुए पदार्थ, पोई का शाक, भारी और शीतल अन्नपान इन सब पदार्थोंको हिक्कारोगी तत्काल त्यागदेवे ॥ १९–२१ ॥