भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 586, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 586
५५४भैषज्यरत्नावली ।[ हिक्काश्वास-

अपुत्रः पुत्रमाप्नोति जीवेद्वर्षशतं सुखी ।
चन्दनादि महातैलं रक्तपित्तं क्षयं ज्वरम् ॥
दाहप्रस्वेददौर्गन्ध्यकुष्ठकण्डुं विनाशयेत् ॥ १२ ॥

सफेद चन्दन, लाल चन्दन, पतंगकी लकडी, काला चन्दन, अगर, काली अगर, देवदारु, धूपसरल, पद्माख, तृणपञ्चमूल ( कुशा, काँस, रामसर, काली ईख, धान ), कपूर, कस्तूरी, मुष्कदाना, शिलारस, नवीनकेशर, जायफल, जावित्री, लौंग, छोटी इलायची, बडी इलायची, कंकोलफल, असवर्ग, तेजपात, नागकेशर, सुगन्धवाला, खस. बालछड, दारचीनी, भीमसेनी कपूर, भूरिछरीला, नागरमोथा, रेणुका, फूल-प्रियंगु, सरलका गोंद, गूगल, लाख, नख, राल, धायके फूल, गठिवन, मंजीठ, तगर और मोम ये प्रत्येक औषधि चार चार मासे लेकर कल्क बनालेवे । इस कल्कके साथ एक प्रस्थ तिलके तैलको यथाविधि मन्दमन्द अग्निके द्वारा पकावे । जब तैल उत्तम प्रकारसे पककर सिद्ध होजाय, तब उतारकर छानलेवे इस तैलको मर्दन करनेसे अस्सी वर्षका बूढा पुरुष भी जवान होजाता है एवं अत्यन्त वीर्यवान् और स्त्रियोंको प्रिय होता है । वन्ध्या स्त्री भी गर्भवती होती है और वृद्ध मनुष्य फिरसे तरुण होता है । पुत्रहीन पुत्रको पाता है और स्वस्थ मनुष्य इसका सेवन करनेसे सौ वर्षतक जीता है । यह बृहच्चन्दनादि तैल रक्तपित्त, क्षय, ज्वर, दाह, स्वेद, दुर्गन्ध कुष्ठ, खुजली आदि विकारोंको शीघ्र विनष्ट करता है ॥ ४-११२ ॥

हिक्कारोगमें पथ्य ।

स्वेदनं वमनं नस्यं धूमपानं विरेचनम् ।
निद्रा स्निग्धानि चाम्लानि मृदूनि लवणानि च ॥ १३ ॥
जीर्णाः कुलत्था गोधूमाः शालयः षष्टिका यवाः ।
एतत्तित्तिरिलावाद्या जाङ्गला मृगपक्षिणः ॥ १४ ॥
पक्वं कपित्थं लशुनं पटोलं बालमूलकम् ।
पौष्करं कृष्णतुलसी मदिरा नलदम्बु च ॥ १५ ॥
उष्णोदकं मातुलुङ्गं माक्षिकं सुरभीजलम् ।
अन्नपानानि सर्वाणि वातश्लेष्महराणि च ॥ १६ ॥
शीताम्बुसेकः सहसा त्रासो विस्मापनं भयम् ।
क्रोधो हर्षः प्रियोद्वेगः प्राणायामनिषेवणम् ॥ १७ ॥