भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५५७
निकलवाना, पूर्वदिशाकी वायुका सेवन, अनुपान (आहार विहारादिके पश्चात् शीतल जल पीना), भेंडका दूध, भेंडका घृत, दूषित जल, मछली, कन्दशाक, सरसों एवं रूक्ष शीतल और गुरुपाकी अन्नपान ये सब श्वास्रोगमें अपथ्य हैं॥१२७॥१२८॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां हिक्काश्वास्रोगचिकित्सा ।
स्वरभंगकी चिकित्सा ।
वाते सलवणं तैलं पित्ते सर्पिः समाक्षिकम् ।
कफे सक्षारकटुकं क्षौद्रं कवल इष्यते ॥ १ ॥
गले तालुनि जिह्वायां दन्तमूलेषु चाश्रितः ।
तेन निष्कृष्यते श्लेष्मा स्वरश्चास्य प्रसीदति ॥ २ ॥
स्वरोपघाते मेदोजे कफवद्विधिरिष्यते ।
क्षयजे सर्वजे चापि प्रत्याख्याय चरेत्क्रियाम् ॥ ३ ॥
वातजनित स्वरभंगरोगमें कुछ गरम कडवे तैलमें सेंधानमक मिलाकर कवल धारण करे, पित्तज स्वरभेदमें घी और शहद मिलाकर और कफोत्पन्न स्वरभङ्ग रोगमें जवाखार, मिरच या पीपल और शहद इनको एकत्र मिलाकर उनका कवल धारण करावे । इस प्रकार करनेसे गला, तालु, जीभ और दाँतोंकी जड़ोंमें स्थित कफ बाहर निकल जाता है, इससे स्वर शुद्ध हो जाता है । मेदोजन्य स्वरभेदमें कफजनित स्वरभेदकी समान चिकित्सा करनी चाहिये । क्षयज और त्रिदोषज स्वरभेदरोगमें असाध्य कहकर स्वरभङ्गरोगमें कही हुई पृथक् पृथक् दोषोंकी मिश्रित चिकित्सा करे ॥ १-३ ॥
अजमोदां निशां धात्रीं क्षारं वह्निं विचूर्णयेत् ।
मधुसर्पिर्युतं लीढ्वा स्वरभेदमपोहति ॥ ४ ॥
अजमोद, हल्दी, आमले, जवाखार और चीता इन सबके समान भाग चूर्णको घी और शहदमें मिलाकर चाटनेसे स्वरभेदरोग दूर होता है ॥ ४ ॥
बदरीपत्रकल्कं वा घृतभृष्टं ससैन्धवम् ।
स्वरोपघाते कासे च लेहमेनं प्रयोजयेत् ॥ ५ ॥