भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ६५८ | भैषज्यरत्नावली । | [ स्वरभंग- |
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बेरके कच्चे पत्तोंको पीसकर घीमें भूनकर सेंधानमकका चूर्ण मिलालेवे। इसको स्वरभंग और कासरोगमें सेवन करनेसे विशेष लाभ होता है ॥ ५ ॥
पिप्पली पिप्पलीमूलं मरिचं विश्वभेषजम् ।
पिबेन्मूत्रेण मतिमान् कफजे स्वरसंक्षये ॥ ६ ॥
कफजनित स्वरभंगमें पीपल, पीपलामूल, मिरच और सोंठ इन औषधियोंका समान भाग चूर्ण गोमूत्रके साथ सेवन करना चाहिये ॥ ६ ॥
चव्यादिचूर्ण ।
चव्याम्लवेतसकटुत्रयतिन्तिडीक-
तालीसजीरकतुगादहनैः समांशैः ।
चूर्णं गुडैः प्रमुदितं त्रिसुगन्धियुक्तं
वैस्वर्यपीनसकफारुचिषु प्रशस्तम् ॥
चव्य, अंमलवेत, सोंठ, मिरच, पीपल, विषांचिल (तिन्तडी), तालीसपत्र, जीरा, वंशलोचन, चीता, दारचीनी, छोटी इलायची और तेजपात इन सब औषधियोंका चूर्ण समान भाग और समस्त चूर्णको बराबर पुराना गुड लेकर सबको एकत्र मर्दन करलेवे। यह चूर्ण स्वरभंग, पीनस और कफजनित अरुचिरोगमें सेवन करना चाहिये ॥ ७ ॥
त्र्यम्बकाभ्र ॥
अभ्रं मेचकमारितं पलमितं व्याघ्री बला गोक्षुरं
कन्या पिप्पलिमूलभृङ्गवृषकाः पत्रं तथा बादरम् ।
धात्रीरात्रिगुडूचिकाः पृथगतः स्वत्त्वैः पलांशैर्युतं
संमर्द्यातिमनोरमं सुवलितं कृत्वा यदा सेवितम् ॥ ८ ॥
कृष्णाभ्रककी भस्मको ४ तोले लेकर कटेरी, खिरेंटी, गोखुरू, घीकुँवार, पीपलामूल, भाङ्गरा, अडूसा, बेरके पत्ते, आमले, हल्दी और गिलोय इनके चार चार तोले रसके द्वारा क्रमसे पृथक् पृथक् भावना देकर उत्तम प्रकारसे खरल करके चनेकी बराबर गोलियाँ बनालेवे ॥ ८ ॥
वातोत्थं कफपित्तजं स्वरगदं यच्च त्रिदोषात्मकं
ह्यात्युच्चैर्वदतो हतं बहुविधं पानीयदोषोद्भवम् ।
कासं श्वासमुरोग्रहं सयकृतं हिक्कां तृषां कामला-
मर्शांसि ग्रहणीं ज्वरं बहुविधं शोथं क्षयं चार्बुदम् ॥