भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 59, कुल 1416 में से
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पञ्चमूल्यादि ।
पञ्चमूलीबलारास्नाकुलत्थैः सहपौष्करैः ।
क्वाथो हन्याच्छिरःकम्पं पर्वभेदं मरुज्ज्वरम् ॥ ४१ ॥
बृहत् पञ्चमूल (बेल, अरलू, कुम्भार, पाढल और अरणी), खिरेंटी, रायसन कुलथी और पोहकरमूल—इन औषधियोंका यथाविधि सिद्ध किया हुआ काथ पान करनेसे शिरःकम्प, सन्धिस्थानोंकी पीडा और वातज्वर नाश होता है ॥ ४१ ॥
कणादि ।
कणारसोनामृतवल्लिविश्वानिदिग्धिकासिन्दुकभूमिंनिम्बैः ।
समुस्तकैराचरितःकषायो हिताशिनां हन्ति गदानिमांस्तु ॥
ज्वरं मरुद्दुष्टिसमुद्भवं च बलासजं चानलमन्दतां च ।
कण्ठावरोधं हृदयावरोधं स्वेदं च हिक्कां च हिमत्वमोहान् ॥ ४३ ॥
पीपल, लहसन, गिलोय, साँठ, कटेरी, सिम्हालू, चिरायता और नागरमोथा—इनका विधिपूर्वक सिद्ध कियाहुआ काथ—पथ्य पदार्थोंका भोजन करनेवाले मनुष्योंके वातज्वर, कफज्वर, अग्निकी मन्दता, कण्ठ और हृदयका अवरोध, अधिक पसीना आना, हिचकी, शरीरकी शीतलता और मूर्च्छा आदि रोगोंको दूर करता है ॥ ४२ ॥ ४३ ॥
शालपर्णी-आदि ।
शालपर्णी बला द्राक्षा गुडूची सारिवा तथा ।
आसां क्वाथं पिबेत्कोष्णं तीव्रवातज्वरच्छिदम् ॥ ४४ ॥
शालपर्णी, खिरेंटी, गिलोय और सारिवा (अनन्तमूल) इनके मन्दोष्ण क्वाथको पान करनेसे तीव्र वातज्वर नष्ट होता है ॥ ४४ ॥
शतपुष्पादि ।
शतपुष्पा वचा कुष्ठं देवदारु हरेणुका ।
कुस्तुम्बुरूणि नलदं मुस्तं चैवाशु साधयेत् ॥
क्षौद्रेण सितया चापि युक्तः क्वाथोऽनिलात्मके ॥ ४५ ॥
सोंफ, वच, कूठ, देवदारु, रेणुका, धनियाँ, खस और नागरमोथा इनके क्वाथको शहद और मिश्रीके साथ मिलाकर सेवन करनेसे वातज्वरमें शीघ्र लाभ होता है ॥ ४५ ॥