भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २८ | भैषज्यरत्नावली । | [ चिकित्सा- |
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किरातादि।
किराताब्दामृतोदीच्यबृहतीद्वयगोक्षुरैः ।
सस्थिराकलसीविश्वैः क्वाथो वातज्वरापहः ॥ ४६ ॥
चिरायता, नागरमोथा, गिलोय, सुगन्धवाला, कटेरी, बडी कटेरी, गोखुरू, शालपर्णी, पृष्ठंपर्णी और सोंठ इनका क्वाथ वातज्वरनाशक है ॥ ४६ ॥
पिप्पल्यादि ।
पिप्पलीसारिवाद्राक्षाशतपुष्पाहरेणुभिः ।
कृतः कषायः सगुडो हन्यात् श्वसनजं ज्वरम् ॥ ४७ ॥
पीपल, अनन्तमूल, दाख, सौंफ और रेणुका इनके क्वाथमें पुराना गुड डालकर पान करनेसे वातज्वर दूर होता है ॥ ४७ ॥
बृहद्गुडूच्यादि ।
गुडूची चन्दनं पद्मानागरेन्द्रयवासकम् ।
अभयारग्वधोदीच्यपाठाधान्याब्दरोहिणी ॥ ४८ ॥
कषायं पाययेदेतत् पिप्पलीचूर्णसंयुतम् ।
कासश्वासज्वरान् हन्ति पिपासादाहनाशनम् ।
विण्मूत्रानिलविष्टम्भे विदोषप्रभवेऽपि च ॥ ४९ ॥
गिलोय, लालचन्दन, पद्माख, सोंठ, इन्द्रजौ, जवास, हरड, अमलतास, सुगन्धवाला, पाठ, धनियाँ, नागरमोथा, और कुटकी, इनका क्वाथ उत्तम प्रकारसों बनाकर उसमें जरासा पीपलका चूर्ण डालकर पान करनेसे खाँसी, श्वास, ज्वर, प्यास, दाह और मल-मूत्र तथा वायुका अवरोध आदि विकार नष्ट होते हैं । यह क्वाथ सन्निपात ज्वरमें भी प्रयोग कियाजाता है ॥ ४८ ॥ ४९ ॥
गुडूच्यादि ।
गुडूची सारिवा द्राक्षा शतपुष्पा पुनर्नवा ।
सगुडोऽयं कषायः स्याद्वातज्वरविनाशनः ॥ ५० ॥
गिलोय, अनन्तमूल, दाख, सौंफ और पुनर्नवा इनके क्वाथमें पुराना गुड डालकर पान करनेसे वातज्वर दूर होता है ॥ ५० ॥
द्राक्षादि ।
द्राक्षागुडूचीकाश्मर्यत्रायमाणाः सशारिवाः ।
निष्क्वाथ्य सगुडं क्वाथं पिबेद्वातज्वरापहम् ॥ ५१ ॥