भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५६३

द्राक्षा पथ्या मातुलुङ्गं लशुनं लवणाईकम् ।
ताम्बूलं मरिचं सर्पिः पथ्यानि स्वरभेदिनाम् ॥ ३५ ॥
स्वेदनक्रिया, वस्तिकर्म, धूम्रपान, विरेचन, कवल धारण करना, नस्य देना, मस्तककी शिराको वेधना, जौ, लालशालिधानोंके चावल, हंस, जंगली मुर्गा और मोर इनका मांसरस, मदिरा, गोखुरू, मकोय, जीवन्तीशाक, कच्ची मूली, दाख, हरड, बिजौरानींबू, लहसुन, सेंधानमक, अद्रख, पान, कालीमिरच और घृत ये समस्त पदार्थ स्वरभङ्गरोगवाले मनुष्योंको हितकारी हैं ॥ ३३–३५ ॥

स्वरभङ्गमें अपथ्य ।
आमं कपित्थं वकुलं शालूकं जाम्बवानि च ।
तिन्दुकानि कषायाणि वर्मि स्वप्नं प्रजल्पनम् ॥
अनुपानं च यत्नेन स्वरभेदी विवर्जयेत् ॥ ३६ ॥
कैथका कच्चा फल, मौलसिंरीके फल, भसींडा, जामुन, तेंदूके फल, कषाय रस-वाले पदार्थोंका सेवन, वमन, अधिक निद्रा, बहुत बोलना और अनुपान (अर्थात् आहार विहारादिपर शीतल जलादिका पान) इन सबको स्वरभंगरोगी यत्नपूर्वक त्यागदेवे ॥ ३६

इति भैषज्यरत्नावल्यां स्वरभङ्ग चिकित्सा ।


अरोचकचिकित्सा ।

वस्तिं समीरणे पित्ते विरेकं वमनं कफे ।
कुर्याद्धृद्यानुकूलानि हर्षणं च मनोजजे ॥ १ ॥
वातकी अरुचिमें वस्तिकर्म, पित्तकी अरुचिमें विरेचन, कफजनित अरुचिमें वमन, शोक और कामादिके द्वारा उत्पन्नहुए अरुचिरोगमें हृदयको हितकारी और मनके अनुकूल और हर्षजनक क्रिया करे ॥ १ ॥

कुष्ठसौवर्चलाजाजी शर्करा मरिचं विडम् ।
धात्र्येलापद्मकोशीरपिप्पल्यश्चन्दनोत्पलम् ॥ २ ॥
लोध्रं तेजोवती पथ्या त्र्यूषणं सयवाग्रजम् ।
आर्द्रदाडिमनिर्यासश्चाजाजीशर्करायुतः ॥ ३ ॥