भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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५६४भैषज्यरत्नावली ।[ अरोचक -

सतैलमाक्षिकाश्चैते चत्वारः कवलग्रहाः ।
चतुरोऽरोचकान् हन्युर्वाताद्येकजसर्वजान् ॥ ४ ॥

(१) कूट, कालानमक, जीरा, खाँड, कालीमिरच और विडनमक, (२) आमले, इलायची, पद्माख, खस, पीपल, चन्दन और कमल, (३) लोध, चव्य, हरड, सोंठ, पीपल, मिरच और जवाखार, (४) अदरखका रस, अनारका रस, जीरा और खाण्ड इन चारों प्रयोगोंमेंसे किसी एकको कडवेतैल और शहदमें मिलाकर उसके कवल, धारण करनेसे वातज, पित्तज, कफज, और सन्निपातज अरुचि दूर होती है। ये चारों प्रयोग अरुचिनाशक हैं ॥ २-४ ॥

त्वङ्मुस्तमेलाधान्यानि मुस्तमामलकं त्वचः ।
त्वक् च दार्बी यमान्यश्च पिप्पल्यस्तेजोवत्यपि ॥ ५ ॥
यमानी तिन्तिडीकं च पंचैते मुखशोधनाः ।
श्लोकपादैरभिहिताः सर्वारोचकनाशनाः ॥ ६ ॥

(१) दारचीनी, नागरमोथा, छोटी इलायची और धनियाँ, (२) नागरमोथ, आमले और दारचीनी, (३) दारचीनी, दारुहल्दी और अजवायनका चूर्ण, (४) पीपल और चव्यका चूर्ण, (५) इमली और अजवायनका चूर्ण ये पाँचों प्रकारके योग मुखको शुद्ध करनेवाले हैं। ये सब प्रयोग सब प्रकारकी अरुचिको दूर करते हैं ॥ ५ ॥ ६ ॥

अम्लीकागुडतोयं च त्वगेलामरिचान्वितम् ।
अभ्यक्तच्छन्दरोगेषु शस्तं कवलधारणम् ॥ ७ ॥

पुरानी इमली और गुडको एकत्र जलके साथ पीसकर उसमें दारचीनी, इलायची और मिरचोंका चूर्ण मिलाकर उसका मुखमें कवल धारण करनेसे अरुचि दूर होती है ॥ ७ ॥

कारव्याजाजी मरिचं द्राक्षा वृक्षाम्लदाडिमम् ।
सौवर्चलं गुडं क्षौद्रं सर्वारोचकनाशनम् ॥ ८ ॥

कालाजीरा, सफेदजीरा, मिरच, दाख, अमलवेत, अनार, कालानमक, गुड और शहद इन सबको समान भाग लेकर एकत्र खरल करके सेवन करनेसे सर्वप्रकारकी अरुचि दूर होती है ॥ ८ ॥

विट्चूर्णमधुसंयुक्तो रसो दाडिमसम्भवः ।
अपाध्यमपि संहन्यादरुचिं वक्त्रधारितः ॥ ९ ॥