भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५६५
अनारके रसमें बिरियासंचरनमक और शहद मिलाकर उसका मुखमें कवल धारण करनेसे असाध्य अरुचि भी दूर होती है ॥ ९ ॥
त्रीण्यूषणानि त्रिफला रजनीद्वयं च
चूर्णीकृतानि यवशूकविमिश्रितानि ।
क्षौद्रान्वितानि वितरेन्मुखधारणार्थ-
मन्यानि तिक्तकटुकानि च भेषजानि ॥ १० ॥
त्रिकुटा, त्रिफला, हल्दी, दारुहल्दी और जवाखार इनको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे । इस चूर्णको शहद और तिक्त, कटु औषधियों ( अर्थात् दारचीनी, इलायची आदि ) के साथ मिलाकर मुखमें धारण करनेसे अरुचि नष्ट होती है ॥ १० ॥
यमानीषाडवं ।
यमानी तिन्तिडीकं च नागरं चाम्लवेतसम् ।
दाडिमं बदरं चाम्लं कार्षिकाण्युपकल्पयेत् ॥ ११ ॥
धान्यसौवर्चलाजाजी वराङ्गं चार्द्धकार्षिकम् ।
पिप्पलीनां शतं चैव द्वे शते मरिचस्य च ॥ १२ ॥
शर्करायाश्च चत्वारि पलान्येकत्र चूर्णयेत् ।
जिह्वाविशोधनं हृद्यं तच्चूर्णं भक्तरोचनम् ॥ १३ ॥
हृत्पीडापार्श्वशूलघ्नं विबन्धानाहनाशनम् ।
कासश्वासहरं ग्राही ग्रहण्यर्शोविकारनुत् ॥ १४ ॥
अजवायन, पुरानी इमली, सोंठ, अमलवेंत, अनारका रस और खट्टे बेर ये प्रत्येक औषधि दो दो तोले एवं धनियाँ, कालानमक कालाजीरा और दारचीनी ये सब एक एक तोला; पीपलें १००, काली मिर्चें २०० और मिश्री १६ तोले लेकर सबको एकत्र चूर्ण करलेवे । यह चूर्ण जिह्वाको शुद्ध करनेवाला, हृदयको हितकारी, भोजनमें रुचि उत्पन्न करनेवाला एवं हृदयकी पीडा, पसलीकी पीडा, विबन्ध, अनाह, खाँसी, श्वास, मलावंरोध, संग्रहणी और अर्श इन सब विकारोंको नष्ट करता है ॥ ११-१४ ॥
कलहंस कांजी ।
अष्टादश शिग्रुफलानि दश मरिचानि विंशतिः पिप्पल्याश्च ।
आर्द्रकफलं गुडपलं प्रस्थद्वयमारनालस्य च ॥ १५ ॥