भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६१६ भैषज्यरत्नावली । [ अरोचक-
एतद्विडलवणसहितं खजाहतं सुरभिगन्धाढ्यम् । व्यञ्जनसहस्रघाति ज्ञेयं कलहंसकं नाम ॥ १६ ॥
सहिंजनेके बीज १८, मिरचें १०, पीपल २०, अदरख ४ तोले, गुड ४ तोले, काँजी २ प्रस्थ और विडियासंचरनमक ४ तोले इन सबको एकत्र मिलाकर उसमें सुगन्धिके लिये दारचीनी, इलायची, तेजपात और नागकेशर इनका चूर्ण यथोचित परिमाणमें मिलादेवे । यह कलहंसनामक काँजी अनेक प्रकारके पदार्थोंसे उत्पन्न हुई अरुचिको दूर करती है ॥ १५ ॥ १६ ॥
तिन्तिडीपानक ।
भागास्तु पञ्च चिञ्चायाः खण्डस्यापि चतुर्गुणाः । धान्यकार्द्रकयोर्भागाश्चतुर्जातार्द्धभागिकम् ॥ १७ ॥ द्विगुणं जलमेतेषामेकपात्रे विलोडितम् । पिहितं तप्तदुग्धेन ततो वस्त्रपरिप्लुतम् ॥ १८ ॥ विधिना धूपिते पात्रे कृत्वा कर्पूरवासितम् । नृपयोग्यमिदं पानं भवेद्युक्त्या सुयोजितम् ॥ १९ ॥
पुरानी इमली २० तोले, खाँड ८० तोले, धनियाँ २ तोले, अदरख २ तोले, दारचीनी, तेजपात, छोटी इलायची और नागकेशर ये प्रत्येक एक एक तोला और इन सबसे दूना शीतल जल लेकर सब औषधियोंको एक मिट्टीके शुद्ध पात्रमें भरकर उत्तम प्रकारस मथे, उसमें थोडा गरम दूध डालकर ढकदेवे । पश्चात् उसको वस्त्रमें छानकर कर्पूर आदि सुगन्धितपदार्थोंसे सुवासित करके अगर आदिके द्वारा धूप दिये हुए पात्रमें भरकर रखदेवे । युक्तिपूर्वक प्रयोग किया हुआ यह पानक राजाओंके सेवन करने योग्य होता है ॥ १७–१९ ॥
रसाला ।
अर्द्धाढकं सुचिरपर्युषितस्य दध्नः खण्डस्य षोडश पलानि शशिप्रभस्य । सर्पिः पलं मधु पलं मरिचं द्विकर्षं शुण्ठ्याः पलार्द्धमपि चार्द्धपलं चतुर्णाम् ॥ २० ॥ शुक्तोपले ललनया मृदुपाणिघृष्टा कर्पूरचूर्णसुरभीकृतभाण्डसंस्था ।