भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५९५
और प्रिय पदार्थोंका देना, सान्त्वना (ढाढस) देना हर्षजनक भय और आश्चर्य-कार्य करना इस प्रकार करनेसे मन, बुद्धि और स्मृति प्रकृतिस्थ होकर उन्मादरोग दूर होय ॥ ८॥ ९ ॥
कामशोकभयक्रोधहर्षेर्ष्यालोभसम्भवान् ।
परस्परप्रतिद्वन्द्वैरेभिरेव शमं नयेत् ॥ १० ॥
काम, शोक, भय, क्रोध, हर्ष, ईर्ष्या और लोभ इन सम्पूर्ण कारणोंसे उत्पन्नहुए उन्मादरोगको उक्त प्रत्येक कारणके विपरीत चिकित्साके द्वारा शमन करे अर्थात् कामज उन्मादमें रोगीको प्रिय स्त्रीप्रदान, शोकज उन्मादमें शोकनाशक क्रिया, भयज उन्मादमें भयनाशक और क्रोधज उन्मादमें क्रोधनाशक क्रिया करनी चाहिये ॥ १० ॥
इष्टद्रव्यविनाशात्तु मनो यस्योपहन्यते ।
तस्य तत्सदृशप्राप्त्या सान्त्वाश्वासैश्च तं जयेत् ॥ ११ ॥
इष्ट वस्तुके नाश होनेसे जिसका मन विकृत होगया हो उसको उसीकी समान वस्तु प्रदान करे, सान्त्वना और आश्वासनजनक वचनोंके द्वारा विकारको शान्त करे ॥ ११ ॥
सर्पिःपानादिनाऽऽगन्तौर्मन्त्रादिश्चेष्यते विधिः ।
पूजाबल्युपहारेष्टिहोममन्त्राञ्जनादिभिः ॥
जयेदागन्तुमुन्मादं यथाविधि शुचिर्भिषक् ॥ १२ ॥
आगन्तुक अर्थात् भूतादिजन्य उन्मादरोगको चैतसघृतादिके पान एवं मन्त्रोच्चारण, पूजा, बलिदान, भेंट, याग, होम मन्त्र और अञ्जनादि क्रियाओंके द्वारा यथाविधि चिकित्सा करके शमन करे ॥ १२ ॥
देवर्षिपितृगन्धर्वैरून्मत्तस्य च बुद्धिमान् ।
वर्जयेदञ्जनादीनि तीक्ष्णानि करमेव च ॥ १३ ॥
देव, ऋषि, पितर और गन्धर्व इनकी बाधासे उत्पन्नहुए उन्मादरोगीके बुद्धिमान् वैद्य तीक्ष्ण अञ्जन-ओषधियोंका प्रयोग एवं ताडनादि न करे ॥ १३ ॥
अञ्जन ।
कृष्णामरिचसिन्धूत्थमधुगोपित्तनिर्मितम् ।
अञ्जनं सर्वभूतोत्थमहोन्मादविनाशम् ॥ १४ ॥
पीपल, कालीमिरच, सैंधानमक, मधु और गोरोचन इन सबको समान भाग