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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५९५

और प्रिय पदार्थोंका देना, सान्त्वना (ढाढस) देना हर्षजनक भय और आश्चर्य-कार्य करना इस प्रकार करनेसे मन, बुद्धि और स्मृति प्रकृतिस्थ होकर उन्मादरोग दूर होय ॥ ८॥ ९ ॥

कामशोकभयक्रोधहर्षेर्ष्यालोभसम्भवान् ।
परस्परप्रतिद्वन्द्वैरेभिरेव शमं नयेत् ॥ १० ॥

काम, शोक, भय, क्रोध, हर्ष, ईर्ष्या और लोभ इन सम्पूर्ण कारणोंसे उत्पन्नहुए उन्मादरोगको उक्त प्रत्येक कारणके विपरीत चिकित्साके द्वारा शमन करे अर्थात् कामज उन्मादमें रोगीको प्रिय स्त्रीप्रदान, शोकज उन्मादमें शोकनाशक क्रिया, भयज उन्मादमें भयनाशक और क्रोधज उन्मादमें क्रोधनाशक क्रिया करनी चाहिये ॥ १० ॥

इष्टद्रव्यविनाशात्तु मनो यस्योपहन्यते ।
तस्य तत्सदृशप्राप्त्या सान्त्वाश्वासैश्च तं जयेत् ॥ ११ ॥

इष्ट वस्तुके नाश होनेसे जिसका मन विकृत होगया हो उसको उसीकी समान वस्तु प्रदान करे, सान्त्वना और आश्वासनजनक वचनोंके द्वारा विकारको शान्त करे ॥ ११ ॥

सर्पिःपानादिनाऽऽगन्तौर्मन्त्रादिश्चेष्यते विधिः ।
पूजाबल्युपहारेष्टिहोममन्त्राञ्जनादिभिः ॥
जयेदागन्तुमुन्मादं यथाविधि शुचिर्भिषक् ॥ १२ ॥

आगन्तुक अर्थात् भूतादिजन्य उन्मादरोगको चैतसघृतादिके पान एवं मन्त्रोच्चारण, पूजा, बलिदान, भेंट, याग, होम मन्त्र और अञ्जनादि क्रियाओंके द्वारा यथाविधि चिकित्सा करके शमन करे ॥ १२ ॥

देवर्षिपितृगन्धर्वैरून्मत्तस्य च बुद्धिमान् ।
वर्जयेदञ्जनादीनि तीक्ष्णानि करमेव च ॥ १३ ॥

देव, ऋषि, पितर और गन्धर्व इनकी बाधासे उत्पन्नहुए उन्मादरोगीके बुद्धिमान् वैद्य तीक्ष्ण अञ्जन-ओषधियोंका प्रयोग एवं ताडनादि न करे ॥ १३ ॥

अञ्जन ।

कृष्णामरिचसिन्धूत्थमधुगोपित्तनिर्मितम् ।
अञ्जनं सर्वभूतोत्थमहोन्मादविनाशम् ॥ १४ ॥

पीपल, कालीमिरच, सैंधानमक, मधु और गोरोचन इन सबको समान भाग

६९६ भैषज्यरत्नावली । [ उन्माद-


लेकर एकत्र खरल करके आँखोंमें आँजनेसे सर्व प्रकारका भूतोन्मादरोग दूर होता है ॥ १४ ॥

निम्बधूप ।

निम्बपत्रवचाहिंगुसर्पनिर्मोकसर्षपैः ।
डाकिन्यादिहरो धूपो भूतोन्मादविनाशनः ॥ १५ ॥

नीमके पत्ते, वच, हींग, साँपकी केंचली और सरसों इन सबको समान भाग लेकर धूप देनेसे डाकिनी आदि भाग जाती हैं और भूतोन्माद शमन होता है ॥ १५ ॥

महाधूप ।

कार्पासास्थिमयूरपुच्छबृहतीनिर्मात्यपिण्डीतकै-
स्त्वग्वांशीवृषदंशविट्‌तुषवचाकेशाहिनिर्मोककैः ।
गोशृङ्गद्विपदन्त हिङ्गुमरिचैस्तुल्यैस्तु धूपः कृतः
स्कन्दान्मादपिशाचराक्षससुरावेशज्वरघ्नः स्मृतः ॥ १६ ॥

कपासके बीज (बिनौले), मोरकी पूँछ, बडी कटेरी, शिवका निर्माल्य, मैनफल, दारचीनी, वंशलोचन, बिलावकी सूखी विष्ठा, धानोंकी भूसी, वच, मनुष्यके बाल, साँपकी केंचली, गौका सींग, हाथीदाँत, हींग और काली मिरच इन सबको समान भाग लेकर एकत्र करके उन्मादरोगीको धूप देनेसे स्कन्द उन्माद, पिशाच, राक्षसबाधा, देवताका आवेश आदि कारणोंसे उत्पन्न हुआ भूतोन्माद और भूतज्वर भी नष्ट होता है ॥ १६ ॥

सारस्वत चूर्ण ।

कुष्ठाश्वगन्धे लवणाजमोदे द्वे जीरके त्रीणि कटूनि पाठा ।
मांगल्यपुष्पी च समान्यमूनि सर्वैः समानां च वचां विचूर्ण्य॥
ब्राह्मीरसेनाखिलमेव भाव्यं वारत्रयं शुष्कमिदं हि चूर्णम् ।
अक्षप्रमाणं मधुना घृतेन लिह्यान्नरः सप्तदिनानि चूर्णम् १८॥

कूठ, असगन्ध, सैंधानमक, अजमोद, कालाजीरा, सफेद जीरा, त्रिकुटा, पाठ और शंखपुष्पी इन सबको समान भाग लेकर चूर्ण करलेवे, फिर उसमें सब चूर्णकी बराबर वचका चूर्ण मिलाकर एकत्र करके ब्राह्मीके रसमें तीनबार भावना देकर धूपमें सुखालेवे । फिर उसको बारीक पीसकर रखलेवे । इस चूर्णको एक एक तोलेकी मात्रासे घृत और शहदके साथ मिलाकर सात दिनपर्यन्त सेवन करे ॥ १७ ॥ १८ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहित । ५९७


सारस्वतमिदं चूर्ण ब्रह्मणा निर्मितं पुरा ।
हिताय सर्वलोकानां दुर्मेधसां विचेतसाम् ॥ १९ ॥
एतस्याभ्यासतः पुंसां बुद्धिर्मेधा धृतिः स्मृतिः ।
सम्पत्तिः कविताशक्तिः प्रवर्द्धेतोत्तरोत्तरम् ॥ २० ॥

इस सारस्वतचूर्णको पूर्वकालमें सम्पूर्ण लोकोंके दुर्बुद्धि और विकृतचित्तवाले मनुष्योंके हितके लिये ब्रह्माजीने निर्माण किया था । इसको सेवन करनेसे मनुष्योंकी बुद्धि, मेधा, धैर्य, स्मरणशक्ति, सम्पत्ति और कवित्वशक्तिकी उत्तरोत्तर वृद्धि होती है ॥ १९ ॥ २० ॥

उन्मादपर्पटीरस ।

कृष्णधुस्तूरजैर्बीजैः पञ्चभिः पर्पटीरसः ।
संप्रयोज्यः प्रशान्त्यर्थमुन्मादं भूतसम्भवम् ॥ २१ ॥

काले धतूरेके ५ बीजोंको लेकर पित्तपापड़ेके रसमें उत्तम प्रकारसे खरल करक भूतोन्मादको शमन करनेके लिये सेवन करे ॥ २१ ॥

उन्मादभञ्जिनी ।

शुद्धं मनःशिलाचूर्णं सैन्धवं कटुरोहिणी ।
वचा शिरीषबीजं च हिङ्गु च श्वेतसर्षपम् ॥ २२ ॥
रञ्बीजं त्रिकटु मलं पारावतस्य च ।
एतानि समभागानि गोमूत्रैर्वटिकां कुरु ॥ २३ ॥
गिरिमल्लीबीजसमां छायाशुष्कां च कारयेत् ।
प्रातः सन्ध्यानिशाकाले चक्षुषोरञ्जनं हितम् ॥ २४ ॥
मधुरादिरसे चांज्यं रात्रावपि जलेन च ।
वटकैषा समाख्याता नाम्ना चोन्मादभञ्जिनी ॥
चातुर्थकमपस्मारमुन्मादस्य विनाशिनी ॥ २५ ॥

शुद्ध मैनसिल, सैंधानमक, कुटकी, वच, सिरसके बीज, हींग, सफेद सरसो, करञ्जके बीज, त्रिकुटा और कबूतरकी बीठ इन सबको समान भाग लेकर गोमूत्रके साथ खरल करके इन्द्रजौकी बराबर गोलियाँ बनाकर छायामें सुखालेवे। इससे एक एक वटीको प्रतिदिन प्रातःकाल और सायंकालमें शहदके साथ और रात्रिमें जलके साथ घिसकर नेत्रोंमें आँजनेसे उन्मादरोगीको विशेष उपकार होता है । इस

६९८ | भैषज्यरत्नावली । | [ उन्माद-

वटीको उन्मादभञ्जिनी कहते हैं। यह वटी चातुर्थकज्वर, अपस्मार और उन्माद-रोगको नष्ट करती है ॥ २२-२५ ॥

उन्मादगजकेसरी ।

सूतं गन्धं शिला तुल्यं स्वर्णबीजं विचूर्ण्य च ।
भावयेदुग्रगन्धायाः क्वाथे मुनिदिनैः पृथक् ॥ २६ ॥
रास्नाक्वाथेन सप्तैव भावयित्वा विचूर्णयेत् ।
रसः सञ्जायते नूनमुन्मादगजकेसरी ॥ २७ ॥
अस्य माषः ससर्पिष्को लीढो हन्ति हठाद्द्रुतम् ।
उन्मादाख्यमपस्मारं भूतोन्मादमपि ज्वरम् ॥ २८ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, मैनसिल और शुद्ध धतूरेके बीज इनको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करके वच और रायसनके क्वाथमें पृथक् पृथक् सात दिनतक सात सात बार भावना देकर खरल करलेवे । इस प्रकार यह उन्मादगजकेशरीरस सिद्ध होता है । इसको प्रतिदिन एक एक माशे परिमाणं लेकर घृतके साथ सेवन करनेसे यह रस उन्माद, अपस्मार, भूतोन्माद और ज्वरको शीघ्र नष्ट करता है ॥ २६-२८ ॥

उन्मादगजांकुश ।

त्रिदिनं कनकद्रावैर्महाराष्ट्रीरसैः पुनः ।
विषमुष्टिद्रवैः सूतं समुत्थाप्यार्कचक्रिकाम् ॥ २९ ॥
कृत्वा तप्तां सगन्धां तां युक्त्या बन्धनमाचरेत् ।
तत्समं कनकं बीजमभ्रकं गन्धकं विषम् ॥ ३० ॥
मर्दनात्त्रिदिनं सर्वं वल्लमात्रं प्रयोजयेत् ।
दोषोन्मादं द्रुतं हन्ति भूतोन्मादं विशेषतः ॥ ३१ ॥

पारेको एक तोला लेकर धतूरेके पत्तोंके रस, जलपीपलके रस और कुचलेके रसमें क्रमसे तीन तीन दिनतक भावना देवे, फिर उसके साथ एक तोला शुद्ध गन्धक मिलाकर ताम्र चक्रिकाको यत्नपूर्वक स्थापन करके पुटपाक करे । फिर उसमें धतूरेके बीज, अभ्रकभस्म, शुद्ध गन्धक और शुद्ध मीठा तेलिया ये प्रत्येक एक एक तोला मिलाकर तीन दिनतक खरल करे । इस रसको प्रतिदिन दो दो रत्ती प्रमाण सेवन करनेसे वात पित्तादि दोषजन्य उन्माद और विशेषकर भूतोन्मादरोग शीघ्र नष्ट होता है ॥ २९-३१ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५९९


उन्मादभञ्जनरस ।

त्रिकटु त्रिफला चैव गजपिप्पलिका तथा ।
देवदारु विडङ्गं च किरातं कुटकी तथा ॥ ३२ ॥
कण्टकारी च यष्टीन्द्रयवं चित्रकमेव च ।
बला च पिप्पलीमूलं मूलं च वीरजस्य च ॥ ३३ ॥
शोभाञ्जनस्य बीजानि त्रिवृता चेन्द्रवारुणी ।
वङ्गं रूप्यकमभ्रं च प्रवालं समभागिकम् ॥ ३४ ॥
सर्वचूर्णसमं लौहं सलिलेन विमर्दयेत् ।
उन्मादमपि भूतोत्थमुन्मादं वातजं तथा ॥ ३५ ॥
अपस्मारं तथा कार्श्यं रक्तपित्तं सुदारुणम् ।
नाशयेदविकल्पेन रसश्चोन्मादभञ्जनः ॥ ३६ ॥

त्रिकुटा, त्रिफला, गजपीपल, देवदारु, वायविडङ्ग, चिरायता, कुटकी, कटैरी, मुलहठी, इन्द्रजौ, चीता, खिरेंटी, पीपलामूल, खसकी जड, सहिंजनेके बीज, निसोत, इन्द्रायण, वङ्गभस्म, चाँदीकी भस्म और अभ्रकभस्म, मूँगाकी भस्म, सब समान भाग और सबके चूर्णकी बराबर लोहभस्म लेकर सबको एकत्र जलके साथ खरल करलेवे । इसको दो दो रत्ती प्रमाण सेवन करे । यह उन्मादभञ्जन रस भूतोन्माद, वातज उन्माद, अपस्मार, कृशता और दारुण रक्तपित्त इन सब रोगोंको नष्ट करता है ॥ ३२-३६ ॥

भूतांकुशरस ।

सूतायस्तारताम्रं च मुक्ता चापि समं समम् ।
सूतपादं तथा वज्रं तालं गन्धं मनःशिला ॥ ३७ ॥
तुत्थं शिलाञ्जनं शुद्धमब्धिफेनं रसाञ्जनम् ।
पञ्चानां लवणानां च प्रतिभागं रसोन्मितम् ॥ ३८ ॥
भृङ्गराजचित्रवज्रीदुग्धेनापि विमर्दयेत् ।
दिनान्ते पिण्डिकां कृत्वा रुद्ध्वा गजपुटे पचेत् ॥ ३९ ॥

शुद्ध पारा, लोहभस्म, चाँदीकी भस्म, ताँबेकी भस्म और मोतीकी भस्म प्रत्येक एक एक तोला, हीरेकी भस्म ३ मासे एवं हरतालकी भस्म, शुद्ध गन्धक, शुद्ध मैनसिल, शुद्ध तूतिया, सफेद सुर्मा, समुद्रफेन, रसौंत और पाँचों नमक ये प्रत्येक एक एक तोला लेवे । इन सबको एकत्र पीसकर भाङ्गरे, चीताके रस और थूहरके

६०० भैषज्यरत्नावली । [उन्माद-

दूधमें क्रमसे पृथक् पृथक् एक दिनतक खरल करके सन्ध्याके समय गोला बनाकर गजपुटमें बन्द करके पकावे ॥ ३७-३९ ॥

भूतांकुशो रसो नाम नित्यं गुञ्ज द्वयं लिहेत् ।
आर्द्रकस्य रसेनापि भूतोन्मादनिवारणः ॥ ४० ॥
पिप्पल्याऽक्तं पिबेच्चानु दशमूलकषायकम् ।
स्वेदयेत्कटुतुम्ब्‍या च तीक्ष्णं रूक्षं च वर्जयेत् ॥ ४१ ॥
माहिषं च घृतं क्षीरं गुर्वन्नमपि भोजयेत् ।
अभ्यङ्गः कटुतैलेन हितो भूतांकुशे रसे ॥ ४२ ॥

यह भूतांकुशनामक रस प्रतिदिन दो दो रत्तीकी मात्रासे अदरखके रसके साथ सेवन करनेसे भूतोन्मादरोग निवारण होता है । इसको सेवन करनेके पश्चात् पीपलका चूर्ण मिलाकर दशमूलका क्वाथ पान करे और कडवी तूंबीके द्वारा स्वेद देवे । इसपर तीखे और रूखे पदार्थ त्याग देने चाहिये । भैंसका घी, भैंसका दूध और गुरु (पचनेमें भारी) अन्नोंका भोजन करे । इस भूतांकुशरसपर शरीरमें सरसोंके तैलकी मालिश करना हितकर है ॥ ४०-४२ ॥

चतुर्भुजरस ।

मृतसूतस्य भागौ द्वौ भागैकं हेमभस्मकम् ।
शिला कस्तूरिका तालं प्रत्येकं हेमतुल्यकम् ॥ ४३ ॥
सर्वं शिलातले क्षिप्त्वा कन्यया मर्दयेद्दिनम् ।
एरण्डपत्रैरावेष्ट्य धान्यराशौ दिनत्रयम् ॥ ४४ ॥
संस्थाप्य च तदुद्धृत्य सर्वरोगेषु योजयेत् ।
एतद्रसायनश्रेष्ठं-

पारेकी भस्म २ भाग, एवं सुवर्णकी भस्म, शुद्ध मैनासिल, कस्तूरी और हरतालकी भस्म ये प्रत्येक एक एक भाग लेवे । सबको खरलमें डालकर घीगुवारके रसके साथ एक दिनतक घोटे, फिर उसको अण्डके पत्तोंसे लपेटकर धानोंके ढेरमें तीन दिनतक गाड देवे, फिर चौथे दिन निकालकर उसको सर्व प्रकारके रोगोंमें प्रयोग करे । यह अत्यन्त श्रेष्ठ रसायन है ॥ ४३ । ४४ ॥-

-त्रिफलामधुमर्दितम् ॥ ४५ ॥
तद्यथाग्निबलं खादेद्वलीपलितनाशनम् ।
आपस्मारे ज्वरे कासे शोषे मन्दानले क्षये ॥ ४६ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६०१


हस्तकम्पे शिरःकम्पे गात्रकम्पे विशेषतः ।
वातपित्तसमुत्थांश्च कफजांनाशयेद् ध्रुवम् ॥
चतुर्भुजरसो नाम महेशेन प्रकाशितः ॥ ४७ ॥

इसको अपनी अग्निके बलानुसार मात्रासे त्रिफलेके और शहदके साथ मिलाकर सेवन करनेसे वली और पलितरोग नष्ट होता है । यह रस अपस्मार, ज्वर, खाँसी, शोष, मन्दाग्नि, क्षय, हाथोंका काँपना, शिरका काँपना, शरीरका काँपना इन सब रोगोंमें उपयोगी और विशेषकर वात, पित्त और कफ इन तीनों दोषोंसे उत्पन्न हुये सर्व प्रकारके उपद्रवोंको अवश्य नष्ट करता है । इस चतुर्भुजनामक रसको श्रीमहादेवजीने निर्माण किया है ॥ ४५-४७ ॥

हिंग्वाद्यघृत ।

हिङ्गुसौवर्चलव्योषैर्द्विपलांशैर्घृताढकम् ।
चतुर्गुणे गवां मूत्रे सिद्धमुन्मादनाशनम् ॥ ४८ ॥

हींग, कालानमक, सोंठ, मिरच, पीपल ये प्रत्येक दो दो पल और घृत एक आढक इन सबको चौगुने गोमूत्रमें डालकर, विधिपूर्वक घृतको सिद्ध करे । इस घृतको पान करनेसे उन्मादरोग शमन होता है ॥ ४८ ॥

लशुनाद्यघृत ।

लशुनस्य विशुद्धस्य तुलार्द्धं निस्तुषीकृतम् ।
तदर्द्धं दशमूल्यास्तु द्वयाढकेऽपां विपाचयेत् ॥ ४९ ॥
पादशेषे घृतप्रस्थं लशुनस्य रसं तथा ।
कोलमूलकवृक्षाम्लमातुलुङ्गार्द्रकैः रसैः ॥ ५० ॥
दाडिमाम्बुसुरामस्तुकाञ्जिकाम्लैस्तदर्द्धिकैः ।
साधयेत्त्रिफलादारुलवणव्योषदीप्यकैः ॥ ५१ ॥
यमानीचव्यहिङ्ग्वम्लवेतसैश्च पलार्द्धिकैः
सिद्धमेतत्पिबेच्छूलगुल्मार्शोजठरानलम् ॥ ५२ ॥
ब्रध्नपाण्डामयप्लीहयोनिदोषकृमिज्वरान् ।
वातश्लेष्मामयांश्चान्यानुन्मादांश्चापकर्षति ॥ ५३ ॥

छिल्केरहित शुद्ध लहसुन ५० पल और दशमूल २५ पल लेकर दोनोंको दो आढक जलमें पकावे । जब पकते पकते चौथाई जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उसमें घी एक प्रस्थ एवं लहसुनका रस, बेरोंका क्वाथ, मूलीका

६०२भैषज्यरत्नावली ।[ उन्माद-

रस, विषांबिल, बिजौरानींबूका रस, अदरखका रस, अनारका रस, मदिरा, दहीका तोड और अम्लकाँजी ये प्रत्येक पदार्थ आधा आधा प्रस्थ एवं हरड, बहेडा, आमला, देवदारु, सेंधानमक, त्रिकुटा, अजमोद, अजवायन, चव्य, हींग, और अमलवेत इनके कल्कको दो-दो तोले डालकर यथाविधि घृतको पकावे। इस प्रकार सिद्ध कियेहुए इस घृतको यथोचित मात्रासे सेवन करनेसे शूल, गुल्म, अर्श, मन्दाग्नि, ब्रध्न, पाण्डु, प्लीहा, योनिरोग, कृमिरोग, ज्वर, वात-कफजन्य रोग, उन्माद और अन्य सर्वप्रकारके रोग दूर होते हैं ॥ ४९-५३ ॥

पानीयकल्याणकघृत ।

विशाला त्रिफला कौन्ती देवदार्त्वेलवालुकम् ।
स्थिरा नतं हरिद्रे द्वे शारिवे द्वे प्रियङ्गुकम् ॥ ५४ ॥
नीलोत्पलैलामञ्जिष्ठा दन्ती दाडिमकेशरम् ।
तालीशपत्रं बृहती मालत्याः कुसुमं नवम् ॥ ५५ ॥
विडङ्गं पृश्निपर्णी च कुष्ठं चन्दनपद्मकौ ।
अष्टाविंशतिभिः कल्कैरेतैरक्षसमन्वितैः ॥
चतुर्गुणं जलं दत्त्वा घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ५६ ॥

इन्द्रायन, त्रिफला, रेणुका, देवदारु, एलुआ, शालपर्णी, तगर, हल्दी, दारु हल्दी, उसवा, अनन्तमूल, फूलप्रियंगु, नीलकमल, इलायची, मंजीठ, दन्ती, अनार, केशर, तालीसपत्र, बडी कटेरी, मालतीके नवीन फूल, वायविडङ्ग, पृश्निपर्णी, कूठ, चन्दन और पद्माख इन २८ औषधियोंके दो दो तोले कल्कके साथ एक प्रस्थ घृतको चौगुना जल डालकर उत्तम प्रकारसे पकावे ॥ ५४-५६ ॥

अपस्मारे ज्वरे कासे शोषे मन्दानले क्षये ॥ ५७ ॥
वातरक्ते प्रतिश्याये तृतीयकचतुर्थके ।
वम्यर्शोमूत्रकृच्छ्रेषु विसर्पोपहतेषु च ॥ ५८ ॥
दोषोपहतचित्तानां गद्गदानामरेतसाम् ।
शतं स्त्रीणां च वन्ध्यानां वर्ण्यायुर्बलवर्द्धनम् ॥ ५९ ॥
अलक्ष्मीपापरक्षोघ्नं सर्वग्रहनिवारणम् ।
कल्याणकमिदं सर्पिः श्रेष्ठं पुंसवनेषु च ॥ ६० ॥

यह कल्याणकनामक घृत अपस्मार, ज्वर, खाँसी, शोष, मन्दाग्नि, क्षय, वातरक्त, प्रतिश्याय, तिजारी और चौथिया ज्वर, वमन, अर्श, मूत्रकृच्छ्र और

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६०३

विसर्परोगमें एवं उन्माद, गद्गदरोग, नपुंसक और सैकड़ों वन्ध्या स्त्रियोंके लिये हितकर एवं बल, वर्ण और आयुकी वृद्धि करता है । दारिद्र्य, पाप, राक्षसबाधा और सर्व प्रकारकी ग्रहबाधाको निवारण करता है और पुंसवन कर्ममें अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥ ५७–६० ॥

क्षीरकल्याणकघृत ।

द्विजलं सचतुःक्षीरं क्षीरकल्याणकं त्विदम् ॥ ६१ ॥

इस क्षीरकल्याण घृतको दूने जल और चौगुने दूधके साथ पानीयकल्याणक घृतकी ओषधियोंका कल्क डालकर सिद्ध करे । यह घृतभी पूर्वोक्त घृतकी समान उपयोगी है ॥ ६१ ॥

महाकल्याणकघृत ।

एभ्य एव स्थिरादीनि जले पक्त्वैकविंशतिम् ।
रसे तस्मिन्पचेत्सर्पिर्गृष्टिक्षीरं चतुर्गुणम् ॥ ६२ ॥
वीराद्विमाषकाकोली स्वयंगुप्तर्षभर्द्धिभिः ।
मेदया च रसैः कल्कैस्तत्स्यात्कल्याणकं महत् ॥
बृंहणीयं विशेषेण सन्निपातहरं परम् ॥ ६३ ॥

शालपर्णी, तगर, हल्दी, दारुहल्दी, उसवा, अनन्तमूल, फूलप्रियंगु, नीलकमल, इलायची, मँजीठ, दन्तीकी जड, अनारके बिज, नागकेशर, तालीसपत्र, बडी कटेरी, मालतीके फूल, वायबिडंग, पृश्निपर्णी, कूट, लालचन्दन और पद्माख इनको समान भाग लेकर चौगुने जलमें पकाकर चतुर्थांशावशिष्ट क्वाथ बनालेवे । फिर उस क्वाथ में एकभाग गौका घी और एकवारंकी ब्याई हुई गौका चौगुना दूध एवं बडी शतावर, मुगवन, मषवन, काकोली, कौंच, ऋषभक, ऋद्धि और मेदा इनका कल्क डालकर घृतको पकावे । इस प्रकार यह महाकल्याणकघृत सिद्ध होता है । यह अत्यन्त बृंहणीय और विशेषकर सन्निपातजन्य रोगको हरता है ॥ ६२ ॥ ६३ ॥

स्वल्पचैतसघृत ।

पञ्चमुल्यावकाशमर्यौ रास्नैरण्डत्रिवृद्बला ।
मूर्वा शतावरी चेति क्वाथैर्द्विपलिकोन्मितैः ॥ ६४ ॥
कल्याणकस्य चाङ्गेन तद् घृतं चैतसं स्मृतम् ।
सर्वचेतोविकाराणां शमनं परमं मतम् ॥ ६५ ॥

६०४ भैषज्यरत्नावली । [ उन्माद-

"घृतप्रस्थोऽत्र पक्तव्यः क्वाथो द्रोणाम्भसा घृतात् ।
चतुर्गुणोऽत्र सम्पाद्यः कल्कः कल्याणकेरितः" ॥६६॥

कुम्भीरको छोड़कर दोनों पञ्चमूलकी अन्य सब ओषधियाँ, रायसन, अण्डकी जड, निसोत, खिरेंटी, मूर्वा और शतावर इन प्रत्येकको आठ आठ तोले लेकर एक द्रोण जलमें पकावे, चौथाई जल शेष रहजानेपर उतारकर छान लेवे। फिर उस क्वाथमें पानीयकल्याणघृतकी सब ओषधियोंका कल्क और घृतको डालकर पकावे। इसको कल्याणकघृतका अङ्ग होनेसे चैतसघृत कहते हैं। यह घृत सर्वप्रकारके मन के विकारोंको शमन करता है। इसको छः छः माशेकी मात्रासे उष्ण दुग्धके साथ सेवन करना चाहिये। "इसमें घी एक प्रस्थ लेना चाहिये, एक द्रोण जल में क्वाथ करे और घीसे चौगुना कल्याण घृतकी ओषधियोंका कल्क डालना चाहिये" ॥ ६४-६६ ॥

महापैशाचिकघृत ।

जटिला पूतना केशी चारटी मर्कटी वचा ।
त्रायमाणा जया वीरा चोरकः कटुरोहिणी ॥ ६७ ॥
कायस्था शूकरीच्छत्रा सातिच्छत्रा पलंकषा ।
महापुरुषद्न्ता च वयःस्था नाकुलीद्वयम् ॥ ६८ ॥
कटम्भरा वृश्चिकाली स्थिरा चैव शृतं घृतम् ।
चातुर्थिकज्वरोन्मादग्रहापस्मारनाशनम् ॥ ६९ ॥
महापैशाचिकं नाम घृतमेतद्यथाऽमृतम् ।
मेधाबुद्धिस्मृतिकरं बालानां चाङ्गवर्द्धनम् ॥ ७० ॥

बालछड, हरड, भूतकेशी, भुईंआमला, कौंचके बीज, वच, त्रायमाण, अरणी, क्षीरकाकोली, चोरपुष्पी, कुटकी, आमले, वाराहीकन्द, सौंफ, छोटा गोखरू, बडी शतावर, ब्राह्मी, रास्ना, गन्धरास्ना, गन्धप्रसारणी, बिछाटी घास और शालपर्णी इन सबके समान भाग मिश्रित कल्क और चौगुने जलके साथ यथाविधि घृतको सिद्ध करे। यह महापैशाचिकनामक घृत चौथियाज्वर, उन्माद, ग्रहबाधा और अपस्मारको नष्ट करनेके लिये अमृतकी समान है। एवं मेधा, बुद्धि, स्मरणशक्ति और बालकोंके अङ्गोंकी वृद्धि करनेवाला है ॥ ६७-७०

शिवाघृत ।

शिवायास्तु सुपूतायाः पञ्चाशत्पलात्पलम् ।
पञ्चपञ्च समादाय पञ्चमूलीयुगात्पृथक् ॥ ७१ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६०५


कुट्टयित्वा चतुःषष्टिशरावैरम्भसः पचेत् ।
ज्ञात्वा पादावशेषेण तेन क्वाथोदकेन च ॥ ७२ ॥
क्षीरस्याष्टाभिराज्यस्य शरावाणां चतुष्टयम् ।
यष्टीमधुकमञ्जिष्ठाकुष्ठचन्दनपद्मकैः ॥ ७३ ॥
विभीतकशिवाधात्रीबृहतीतगरादिकैः ।
विडङ्गदाडिमीदेवदारुदन्तीहरेणुभिः ॥ ७४ ॥
तालीसकेशरश्यामाविशालातालपर्णिभिः ।
प्रियङ्गुमालतीपुष्पकाकोलीयुगलोत्पलैः ॥ ७५ ॥
हरिद्रायुगलानन्तामेदैलाह्रिवालुकैः ।
सपृश्निपर्णीकिरैभिः कल्कैरक्षसमन्वितैः ॥ ७६ ॥

गीदडका शुद्ध किया हुआ मांस ५० पल लेकर एक कपडेकी पोटलीमें बांधलेवे और दशमूलकी प्रत्येक ओषधि पाँच पाँच पल लेकर एकत्र कूटकर सबको चौसठ शराव परिमाण जलमें पकावे । जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे । फिर उस काढ़ेमें बकरीका दूध ८ शराव परिमाण बकरीका घी ४ शराव परिमाण एवं मुलहठी, मंजीठ, कूठ, लालचन्दन, पद्माख, बहेडा, हरड, आमले, बडी कटेरी, तगर, वायविडंग, अनारके बीज, देवदारु, दन्ती, रेणुका, तालीशपत्र, नागकेशर, सारिवा, इन्द्रायनकी जड, शालपर्णी, फूलप्रियंगु, मालतीके फूल, काकोली, क्षीरकाकोली, कमल, नीलकमल, हल्दी, दारुहल्दी, अनन्तमूल, मेदा, इलायची, एलुआ और पृश्निपर्णी इन प्रत्येक ओषधिके दो दो तोले कल्कको डालकर उत्तम प्रकारसे घृतको सिद्ध करे ॥७१-७६॥

सिद्धमेतद् घृतं यच्च तन्मे निगदितं शृणु ।
देवासुरग्रहग्रस्ते मानसे राक्षसक्षते ॥ ७७ ॥
गन्धर्वधर्षिते चैव पितृग्रहनिपीडिते ।
भूतैरप्यभिभूते च पिशाचैश्च परिप्लुते ॥ ७८ ॥
भुजङ्गमगृहीते च तथा जाङ्गलभक्षिते ।
यक्षैरपि परिक्षिप्ते भयैरप्यार्दिते भृशम् ॥ ७९ ॥
शस्यते सर्ववाते च सर्वापस्मार एव च ।
शोषे सोरःक्षते कासे पीनसे च मदात्यये ॥ ८० ॥

-६०६ भैषज्यरत्नावली । [ उन्माद -


मेहे मूत्रग्रहे चैव ज्वरे जीर्णे च शस्यते ।
वृष्यं बलकरं हृद्यं वन्ध्यानामपि पुत्रदम् ॥ ८१ ॥
श्रीविन्ध्यवासिपादेन सिद्धिदं समुदीरितम् ।
शिवाघृतमिदं नाम्ना शिवायोन्मादिनां सदा ॥ ८२ ॥

इस प्रकार सिद्ध किया हुआ यह घृत देवता, असुर, ग्रहादिकी बाधासे उत्पन्न हुए उन्माद, राक्षसपीडा, गन्धर्वबाधा, पितर, भूत, पिशाच और नागोंके ग्रसनेसे उत्पन्न हुए उन्माद या जाङ्गली जीवोंका मांस खानेसे उत्पन्न हुए विकार, यक्षबाधा, भयसे अत्यन्त आक्रान्त होनेपर एवं सर्वप्रकारके वातरोग, सर्व प्रकारके अपस्मार, उरःक्षत, खाँसी, पीनस, मदात्यय, प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र और जीर्णज्वर इन सब रोगोंमें हितकारी है । यह घृत अत्यन्त वीर्यवर्द्धक, बलकारक, हृदयको हितकारी, वन्ध्या-स्त्रियोंको पुत्रदायक और श्रीविन्ध्येश्वरी देवीकी कृपासे सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाला है । यह शिवानामक घृत उन्मादरोगियोंके लिये सदा कल्याणकारक है ॥७७-८२॥

शिवातैल ।

प्रस्थं शृगालमांसस्य त्यक्त्वा मुखनखादिकम् ।
दशमूलतुलाद्धं च जलद्रोणे विपाचयेत् ॥ ८३ ॥
पादशेषे रसे तस्मिन्क्षीरं दत्त्वा चतुर्गुणम् ।
प्रस्थं च तिलतैलस्य कल्कं दत्त्वा प्रयत्नतः ॥ ८४ ॥
पञ्चमूली वचा कुष्ठं शैलेयं शारिवाद्वयम् ।
धुस्तूरवरुणामूलं घण्टाकी बृहतीद्वयम् ॥ ८५ ॥
चित्रकं पिप्पलीमूलं मधुकं सैन्धवं बला ।
शतपुष्पा देवदारु रास्ना वारणपिप्पली ॥ ८६ ॥
मुस्ता शठी च लाक्षा च ( प्र ) सारणी रक्तचन्दनम् ।
एषां च कार्षिकं भागं शनैर्मृद्वग्निना पचेत् ॥ ८७ ॥

मुख और नखादि रहित गीदडका मांस ( पोटलीमें बँधा हुआ ) एक प्रस्थ और दशमूल समान भाग मिश्रित ५० पल लेकर सबको एक द्रोण जलमें पकावे । जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे । फिर उस काढेमें गोदुग्ध चार प्रस्थ, तिलका तैल एक प्रस्थ एवं बेलकी छाल, सोना-पाठेकी छाल, कम्भारी, पाढर, अरणी, वच, कूठ, भूरिछरीला, उसवा,

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६०७


अनन्तमूल, धतूरेके बीज, वरनाकी जड़, बैंगन, बडी कटेरी, चीता, पीपलामूल, मुलहठी, सेंधानमक, खिरेंटी, सोया, देवदारु, रायसन, गजपीपल, नागरमोथा, कचूर, लाख, प्रसारणी और लालचन्दन इनके एकएक कर्ष कल्कको डालकर मन्दमन्द अग्निके द्वारा शनैः शनैः तैलको पकावे ॥ ८३-८७ ॥

वातिकं पैत्तिकं चैव श्लैष्मिकं सान्निपातिकम् ।
उन्मादं सकलं हन्ति वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ॥ ८८ ॥
सर्ववातविकारघ्नमेकाङ्गं सर्वसंग्रहम् ।
अपस्मारे ज्वरे कासे हनुस्तम्भार्दितेऽशुभे ॥ ८९ ॥
भूतोन्मादे क्रोधोन्मादे ऊर्ध्वजत्रुगदेऽपि च ।
तैलमेतत्प्रयोक्तव्यं शिवया निर्मितं शुभम् ॥ ९० ॥

इस प्रकार सिद्ध कियाहुआ यह तैल वातज, कफज और सन्निपातज इन सर्वप्रकारके उन्माद सम्पूर्ण वातरोग और एकाङ्ग व सर्वाङ्गकी पीडा इन सबको इस प्रकार नष्ट करदेता है जैसे वज्र वृक्षोंको। इसको अपस्मार, ज्वर, खाँसी, हनुस्तम्भ, क्रोधजन्य उन्माद और ऊर्ध्वजत्रु रोगोंमें भी प्रयोग करना चाहिये । इस उत्तम तैलको श्रीपार्वतीजीने निर्माण किया है ॥ ८८-९० ॥

तैलं नारायणं वापि महानारायणं तथा ।
हितमत्र प्रयोक्तव्यमिति चक्रेण भाषितम् ॥ ९१ ॥

उन्मादरोगमें नारायणतैल अथवा महानारायणतैलका प्रयोग करना चाहिये यह चक्रदत्तका मत है ॥ ९१ ॥

उन्मादरोगमें पथ्य ।

आश्वासनत्रासनबन्धनानि भयानि दानानि च हर्षणानि ।
धूपो दमो विस्मरणं प्रदेहः शिराव्यधः संशमनं च सेकः ॥ ९२
आश्चर्य्यकर्म्माणि च धूमपानं धीधैर्य्यसत्त्वात्मनिवेदनानि ।
अभ्यञ्जनं स्नापनमासनं च निद्रा सुशीतान्यनुलेपनानि ॥ ९३
गोधूममुद्गारुणशालयश्च धारोष्णदुग्धं शतधौतसर्पिः ।
नवीनभूतं च पुरातनं च कूर्मामिषं धन्वरसा रसालम् ॥ ९४ ॥
पुराणकूष्माण्डफलं पटोलं ब्राह्मीदलं वास्तुकतण्डुलीयम् ।
खराश्वमूत्रं गगनाम्बु पथ्या सुवर्णचूर्णानि च नारिकेलम् ॥
द्राक्षा कपित्थं पनसंच वैद्यैर्विधेयमुन्मादगदेषु पथ्यम् ॥ ९५ ॥

६०८भैषज्यरत्नावली ।[ अपस्मार-

आश्वासन देना, डराना, बांधना, भय, दान, हर्ष आदिके काम, धूप, इन्द्रियरोगके भुलानेवाली बातें, सुगन्धित वस्तुओंका प्रलेप, शिरा वेधना, संशमन ओषधियाँ, जलसिञ्चन, आश्चर्यजनक कार्य, धूमपान, बुद्धि, धीरता, सत्त्वगुण ये आत्मज्ञानका वर्णन, तैलकी मालिश, स्नान, स्थिरचित्तसे बैठना, शयन करना, शीतल पदार्थोंका प्रलेप करना, गेहूँ, मूँग, लालशालि धानोंके चावल, धारोष्ण दूध, सौबारका धोया हुआ घी, नैनी घी और पुराना घी, कछुवएका मांस, मरुदेशोत्पन्न पशु-पक्षियोंका मांसरस, रसाला, पुराना पेठा, परवल, ब्राह्मीका शाक, बथुएका शाक, चौलाईका शाक, गदहेका मूत्र, घोडेका मूत्र, वर्षाका जल, हरड, सुवर्णभस्म, नारियल, दाख, कैथ कटहल ये सब उन्मादरोगमें पथ्य हैं ॥ ९२–९५ ॥

उन्मादरोगमें अपथ्य ।

मद्यं विरुद्धाशनमुष्णभोजनं निद्राक्षुधातृट्कृतवेगधारणम् ।
व्यवायमाषाढफलं कठिल्लकं शाकानि पत्रप्रभवाणि सर्वशः ॥
तिक्तानि बिम्बीचभिपक्वसमादिशेदुन्मादरोगोपहतेषुगर्हितम् ॥

मदिरा, विरुद्ध आहार, गरमभोजन, निद्रा, क्षुधा और तृषा इनके वेगको रोकना, स्त्रीप्रसङ्ग, ढाकके बीज, करेला, सर्वप्रकारके पत्रशाक, कडवे पदार्थ और कन्दूरी ये सब पदार्थ उन्मादरोगमें अपथ्य हैं ॥ ९६ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यामुन्मादरोगचिकित्सा ।


अपस्माररोगकी चिकित्सा ।

वातिकं वस्तिभिः प्रायः पैत्तं प्रायो विरेचनैः ।
श्लैष्मिकं वमनप्रायैरपस्मारमुपाचरेत् ॥ १ ॥

वातज अपस्मारको प्रायः वस्तिकर्मके द्वारा, पित्तज अपस्मारको विरेचनसे और कफजनित अपस्मार रोगको प्रायः वमनके द्वारा शमन करे ॥ १ ॥

पुष्योद्धतं शुनः पित्तमपस्मारघ्नमञ्जनम् ।
तदेव सर्पिषा युक्तं धूपनं परमं स्मृतम् ॥ २ ॥

पुष्यनक्षत्रमें कुत्तेके पित्तको निकालकर आँखोंमें आँजनेसे अथवा उसको घृतके साथ मिलाकर धूनी देनेसे अपस्मार रोग नष्ट होता है ॥ २ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६०९

नकुलोलूकमार्जारगृध्रकीटाहिकाकजैः ।
तुण्डैः पक्षैः पुरीषैश्च धूपनं कारयेद्भिषक् ॥ ३ ॥
अपस्मारमें वैद्य नौला, उल्लू, बिलाव, गिद्ध, कीड़ा, सर्प और कौआ इन सबकी चोंच, पंख और विष्ठाकी धूप दिलवानी चाहिये ॥ ३ ॥

मनोह्वा तार्क्ष्यजं चैव शकृत्पारावतस्य च ।
अञ्जनं हन्त्यपस्मारमुन्मादं च विशेषतः ॥ ४ ॥
मैनसिल, रसौंत और कबूतरकी बीठ इनको एकत्र पीसकर आंखोंमें आँजनेसे अपस्मार और विशेषकर उन्मादरोग नष्ट होता है ॥ ४ ॥

अपेतराक्षसीकुष्ठपूतनाकेशिचोरकैः ।
उत्सादनं मूत्रपिष्टैर्मूत्रैरेवावसेचनम् ॥ ५ ॥
सफेद तुलसीकी जड़, कूठ, हरड, भूतकेशी और भटेउर इन सबको समान भाग लेकर बकरेके मूत्रमें पीसकर शरीरमें मालिश करनेसे अथवा बकरेके मूत्रमें मिलाकर सेचन करनेसे अपस्मार शमन होता है ॥ ५ ॥

जतुकाशकृता तद्वद् दग्धैर्वा बस्तलोमभिः ।
अपस्मारहरो लेपो मूत्रसिद्धार्थशिग्रुभिः ॥ ६ ॥
गोमूत्रके साथ चिमगादड़की विष्ठा या बकरेके भस्म किये हुए रोम या सफेद सरसों और सहिंजनेके बीजोंको पीसकर लेप करनेसे अपस्मार दूर होय ॥ ६ ॥

यः खादेत्क्षीरभक्ताशी माक्षिकेण वचारजः ।
अपस्मारं महाघोरं स चिरोत्थं जयेद् ध्रुवम् ॥ ७ ॥
यदि दूध और भातका भोजन करनेवाला मनुष्य शहदके साथ वचके चूर्णको मिलाकर सेवन करे तो वह चिरकालोत्पन्न और महाभयंकर अपस्मारको अवश्य जीतता है ॥ ७ ॥

उल्लम्बितनरग्रीवापाशं दग्ध्वा कृता मसी ।
शीताम्बुना समं पीत्वा हन्त्यपस्मारमुद्धतम् ॥ ८ ॥
फाँसीके द्वारा मरेहुए मनुष्यकी गर्दनकी रस्सीको जलाकर स्याही बनालेवें। उस स्याहीको शीतल जलके साथ पान करनेसे अत्युग्र अपस्मार नष्ट होता है ॥ ८ ॥

प्रयोज्यं तैललशुनं पयसा वा शतावरी ।
ब्राह्मीरसश्च मधुना सर्वापस्मारभेषजम् ॥ ९ ॥
तैलके साथ लहसुन अथवा दूधके साथ शतावर या ब्राह्मीके रसको शहदके साथ सेवन करनेसे सर्व प्रकारका अपस्मार दूर होता है ॥ ९ ॥

३९

६१० भैषज्यरत्नावली [ अपस्मार-

निर्दह्य निर्द्रवां कृत्वा च्छागिकामरनालिकाम् । तामम्लसाधितां खादेदपस्मारमुदस्यति ॥ १० ॥ बकरीकी अमरानामक नाडीको रक्तादिसे शुद्ध करके अच्छे प्रकारसे जलाकर उसको काँजीके साथ पकाकर सेवन करनेसे अपस्मार नष्ट होता है ॥ १० ॥

अभ्यङ्गे सार्षपं तैलं बस्तमूत्रे चतुर्गुणे । सिद्धं स्याद्रोशकृन्मूत्रैः स्नानोत्सादनमेव च ॥ ११ ॥ सरसोंके तैलको चौगुने बकरेके मूत्रमें पकाकर मालिश करना अथवा गोबरको शरीरपर मलना और गोमूत्रसे स्नान व सेचन करना आदि उपचारोंसे अपस्मार दूर होता है ॥ ११ ॥

सूतभस्मप्रयोगः। शङ्खपुष्पी वचा ब्राह्मी कुष्ठमेलाग्रसैः सह । सूतभस्मप्रयोगोऽयं रक्तिकाद्वयमानतः ॥ सर्वापस्मारनाशाय महादेवेन भाषितः ॥ १२ ॥ शङ्खपुष्पी, वच, ब्राह्मी, कूट और इलायची इनके क्वाथके साथ दो दो रत्ती परिमाण पारेकी भस्मको सेवन करे । सर्वप्रकारके अपस्मारको नाश करनेके लिये श्रीमहादेवजीने इस प्रयोगको वर्णन किया है ॥ १२ ॥

इन्द्रब्रह्मवटी । मृतसृताभ्रकं तीक्ष्णं तारं ताप्यं विषं समम् । पद्मकेशरसंयुक्तं दिनैकं मर्दयेद् द्रवैः ॥ १३ ॥ स्नुह्यग्निविजयाैरण्डवचानिष्पावझरणैः । निर्गुण्ड्याश्च द्रवैर्मर्द्यं तद्गोलं पाचयेत्पुनः ॥ १४ ॥ कङ्गुनीसर्षपोत्थेन तैलेन गन्धसंयुतम् । ततः पक्त्वा समुद्धृत्य चणमात्रा वटी कृता ॥ १५ ॥ इन्द्रब्रह्मवटी नाम भक्षयेदार्द्रकद्रवैः । दशमूलकषायं च कणायुक्तं पिबेदनु ॥ अपस्मारं जयत्याशु यथा सूर्योदये तमः ॥ १६ ॥ पारेकी भस्म, अभ्रकभस्म, लौहभस्म, चाँदीकी भस्म, सोनामाखीकी भस्म, शुद्ध मीठा तेलिया और कमलकी केशर इनको समान भाग लेकर सबको एकत्र करके थूहर, चीता, भाँग, अण्ड, वच, सेम, जमाकन्द और निर्गुण्डी इनके

[ चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६२१


रसमें क्रमसे एक एक दिनतक खरल कर गोला सा बनालेवे । फिर पुटपाक करकें उस औषधकी समान भाग शुद्ध गन्धक मिलाकर मालकांगनी और सरसोंके तैलमें पकाकर चनेकी बराबर गोलियां बनालेवे । इस इन्द्रवृक्षवटीकी प्रतिदिन एक एक गोलीको अदरखके रस और शहदके साथ भक्षण करके पीपलका चूर्ण मिलाकर दशमूलका क्वाथ पान करे । इससे अपस्मार इस प्रकार दूर होता है, जैसे सूर्य्य का प्रकाश होनेपर अन्धकार तत्काल नष्ट होता है १३-१६

भूतभैरव रस ।

शुद्धसूतार्कलोहं च शिलागन्धकतालकम् ।
रसाञ्जनं च तुल्यांशं नरमूत्रेण मर्दयेत् ॥ १७ ॥
तद्गोलं द्विगुणं गन्धं लौहपात्रे क्षणं पचेत् ।
पञ्चगुञ्जामितं भक्ष्यमपस्मारहरं परम् ॥ १८ ॥
हिङ्गु सौवर्चलं व्योषं नरमूत्रेण सर्पिषा ।
कर्षमात्रं पिबेच्चानु रसोऽयं भूतभैरवः ॥ १९ ॥

शुद्ध पारा, तांबा, लोहा, मैनसिल, शुद्ध गन्धक, हरताल और रसौंत इनको सम भाग लेकर मनुष्यके मूत्रके साथ खरल कर गोला बनालेवे । फिर उसमें समस्त औषधसे दुगुनी शुद्ध गन्धक मिलाकर लोहेके पात्रमें थोडी देरतक मन्द मन्द अग्निके द्वारा पकावे । इस भूतभैरवरसको प्रतिदिन पाँच पाँच रत्ती प्रमाण भक्षण करे और ऊपरसे हींग, कालानमक, सोंठ, मिरच और पीपल इनके एक कर्ष परिमाण चूर्णको मनुष्यके मूत्र और घीमें मिलाकर सेवन करे । यह रस अपस्मारको हरनेके लिये अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥ १७-१९ ॥

वातकुलान्तक ।

मृगनाभिः शिवा नागकेशरं कलिवृक्षजम् ।
पारदं गन्धकं जातीफलमेलालवङ्गकम् ॥ २० ॥
प्रत्येकं कार्षिकं चैव श्लक्ष्णचूर्णं च कारयेत् ।
जलेन मर्दयित्वा तु वटीं कुर्याद्विरक्तिकाम् ॥ २१ ॥
यथाव्याध्यनुपानेन योजयेच्च चिकित्सकः ।
अपस्मारे महाघोरे मूर्च्छारोगे च शस्यते ॥ २२ ॥
वातजान्सर्वरोगांश्च हन्यादचिरसेवनात् ।
नातः परतरं श्रेष्ठमपस्मारेषु वर्त्तते ॥
ब्रह्मणा निर्मितः पूर्वं नाम्ना वातकुलान्तकः ॥ २४ ॥

६१२ | भैषज्यरत्नावली । | [ अपस्मार-

कस्तूरी, हरड, नागकेशर, बहेडा, पारा, गन्धक, जायफल, इलायची और लौंग इन प्रत्येकको एक एक कर्ष लेकर बारीक चूर्ण करलेवे । फिर उस चूर्णको जलके साथ खरल कर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । वैद्य इस रसको यथादोषानुसार अनुपानके साथ अत्यन्त प्रबल अपस्मार और मूर्च्छारोगमें प्रयोग करे । यह सर्वप्रकारके वातरोगोंको बहुत शीघ्र नष्ट करता है । अपस्माररोगपर इस रससे बढकर अन्य कोई श्रेष्ठ औषधि नहीं है । इस वातकुलान्तक रसको पूर्वकालमें ब्रह्माजीने निर्माण किया है ॥२०-२३॥

कूष्माण्डघृत ।

कूष्माण्डस्वरसे सर्पिरष्टादशगुणे पचेत् ।
यष्ट्याह्वकल्कं तत्पानमपस्मारविनाशनम् ॥ २४ ॥

अठारह गुने पेठेके स्वरसमें १ भाग गोघृत, चौथाई भाग मुलहठीका कल्क डालकर घृतको पकावे । उस घृतको पान करतेही अपस्मार नाश होताहै ॥२४॥

ब्राह्मीघृत ।

ब्राह्मीरसे वचाकुष्ठशङ्खपुष्पीभिरेव च ।
पुराणं मेध्यमुन्मादग्रहापस्मारनुद् घृतम् ॥ २५ ॥

ब्राह्मीके रसमें वच, कुठ और शङ्खपुष्पी इनके समान भाग मिश्रित कल्कके साथ पुराने घृतको डालकर पकावे । वह घृत मेधाजनक एवं उन्माद, ग्रंहबाँधाँ और अपस्माररोगनाशक है ॥ २५ ॥

स्वल्पपञ्चगव्य घृत ।

गोशकृद्रसदध्यम्लक्षीरमूत्रैः समैर्घृतम् ।
सिद्धं चातुर्थिकोन्मादग्रहापस्मारनाशनम् ॥ २६ ॥

गौके गोबरका रस, खट्टा दही, दूध, गोमूत्र और घी इन सबको समान भाग लेकर यथाविधि घृतको सिद्ध करे । इस घृतको सेवन करनेसे चौथिया ज्वर, उन्माद, ग्रहपीडा और अपस्मार नष्ट होजाताहै ॥ २६ ॥

बृहत्पञ्चगव्यघृत ।

द्वे पञ्चमूले त्रिफलां रजन्यौ कुटजत्वचम् ।
सप्तपर्णमपामार्गं नीलिनीं कटुरोहिणीम् ॥ २७ ॥
शम्याकं फल्गुमूलं च पौष्करं सदुरालभम् ।
द्विपलांनि जलद्रोणे पचेत् पादावशेषिते ॥ २८ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६१३

दोनों पञ्चमूल, त्रिफला, हल्दी, दारुहल्दी, कुडेकी छाल, सतवन, चिरंचिटा, नील, कुटकी, अमलतास, कठूमरकी जड, पोहकरमूल, और धमासा इन प्रत्येक ओषधिको आठ आठ तोले लेकर एक द्रोण जलमें पकावे । जब पककर चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे ॥ २७ ॥ २८ ॥

भाङ्गीं पाठां त्रिकटुकं त्रिवृतां निचुलानि च ।
श्रेयसीमाढकीं मूर्वी दन्तीं भूनिम्बाचित्रकौ ॥
द्वे शारिवे रौहिषं च भूतिकां मदयन्तिकाम् ॥ २९ ॥
क्षिपेत्पिष्ट्वाऽक्षमात्राणि तैः प्रस्थं सर्पिषः पचेत् ।
गोशकृद्रसदध्यम्लक्ष्ीरमूतैश्च तत्समैः ॥
पञ्चगव्यमिदं ख्यातं महत्तदमृतोपमम् ॥ ३० ॥

फिर उसमें भारङ्गी, पाठ, त्रिकुटा, निसोत, जलबेंत, गजपीपल, अरहर, मूर्वा, दन्ती, चिरायता, चीता, कालीसर, गौरीसर, रोहिषतृण, अंजवायन और मोतिया के फूल इन प्रत्येकका कल्क दो दो तोले एवं गौका घी, गोबरका रस, खट्टा दही, दूध और गोमूत्र ये प्रत्येक एक एक प्रस्थ डालकर उत्तम प्रकारसे घृतको पकावे ॥ २९ ॥ ३० ॥

अपस्मारे ज्वरे कासे श्वयथावुदरे तथा ॥ ३१ ॥
गुल्मार्शःपाण्डुरोगेषु कामलायां हलीमके ।
अलक्ष्मीग्रहरक्षोघ्नं चातुर्थिकविनाशनम् ॥ ३२ ॥

यह बृहतपञ्चगव्यनामक घृत अपस्मार, ज्वर, खाँसी, शोथ, उदररोग, गुल्म, अर्श, पाण्डुरोग, कामला और हलीमकादि रोगोंमें अमृतकी समान हितकर है । एवं दारिद्य, ग्रहबाधा, राक्षसबाधा, और चातुर्थिकज्वर को दूर करता है ॥ ३१ ॥ ३२ ॥

महाचैतसघृत ।

शणस्त्रिवृत्तथैरण्डो दशमूली शतावरी ।
रास्ना मागधिका शिग्रुः क्वाथ्यं द्विपलिकं भवेत् ॥ ३३ ॥
विदारी मधुकं मेदे द्वे काकोल्यौ सिता तथा ।
एभिः खर्जूरमृद्वीकाभीरुमुञ्चातगोक्षुरैः ।
चैतसस्य घृतस्याङ्गे पक्तव्यं सर्पिरुत्तमम् ॥ ३४ ॥

सनके बीज, निसोत, अण्डकी जड, दशमूल, शतावरं, रायसन, पीपल और सहिंजना इन प्रत्येक ओषधिको आठ आठ तोले लेकर क्वाथ बनालेवे । फिर उस

६१४ | भैषज्यरत्नावली । | [ अपस्मार-

क्वाथमें विदारीकन्द, मुलहठी, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, मिश्री, खजूर, दाख, शतावर, पुष्पशाकभेद (अभावमें ताड़का गूदा), गोखरू और चैतसघृतकी समस्त औषधियोंके कल्कके साथ उत्तम प्रकारसे घृतको पकाना चाहिये ॥ ३३ ॥ ३४ ॥

महाचैतससंज्ञं तु सर्वापस्मारनाशनम् ॥ ३५ ॥
गरोन्मादप्रतिश्यायतृतीयकचतुर्थकान् ।
पापालक्ष्मीर्जयेदेतत्सर्वग्रहनिवारणम् ॥ ३६ ॥
श्वासकासहरं चैव शुक्रार्त्तवविशोधनम् ।
घृतमानं क्वाथविधिरिह चैतसवन्मतः ॥ ३७ ॥
कल्कश्चैतसकल्कोक्तद्रव्यैः सार्धं च पादिकः ।
“नित्यं मुञ्जातकाभावे तालमस्तकमिष्यते” ॥ ३८ ॥

यह महाचैतसनामक घृत सर्वप्रकारके अपस्मारको नष्ट करता है एवं विषोत्पन्न, उन्माद, प्रतिश्याय, तिजारीज्वर, चौथियाज्वर, पापग्रह, अलक्ष्मी, सर्वप्रकारकी ग्रह-बाधा, श्वाँस और खाँसी इन सबको निवारण करता है। शुक्र और आर्त्तवको शुद्ध करता है। इसमें चैतसघृतकी समान यथाविधि क्वाथ बनाकर उसमें उक्त घृतके कल्ककी समस्त औषधियोंका कल्क एक भाग और घी चार भाग डालकर घृतको सिद्ध करें ॥ ३५-३८ ॥

पलंकषाद्यतैल ।

पलङ्कषावचापथ्यावृश्चिकाल्यर्कसर्षपैः ।
जटिलापूतनाकेशीलाङ्गलीहिङ्गुचोरकैः ॥ ३९ ॥
लशुनातिविषाचित्राकुष्ठैर्विङ्द्भिश्च पक्षिणाम् ।
मांसाशिनां यथालाभं बस्तमूत्रे चतुर्गुणे ॥
सिद्धमभ्यञ्जनात्तैलमपस्मारविनाशनम् ॥ ४० ॥

गोरखमुण्डी, वच, हरड, बिछांटी घास, आककी जड, सरसों, बालछड, भूत-केशी, जलपीपल, हींग, असवरग, लहसन, अतीस, चीता, कूठ और बाज आदि मांसाहारी पक्षियोंकी (जितनी प्राप्त होसके) विष्ठा इन सबके समान भाग मिश्रित कल्कके साथ तिलके तैलको बकरेके चौगुने मूत्रमें सिद्ध करे। इस तैलको शरीरमें मर्दन करनेसे अपस्माररोग नाश होता है ॥ ३९ ॥ ४० ॥