भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६०९
नकुलोलूकमार्जारगृध्रकीटाहिकाकजैः ।
तुण्डैः पक्षैः पुरीषैश्च धूपनं कारयेद्भिषक् ॥ ३ ॥
अपस्मारमें वैद्य नौला, उल्लू, बिलाव, गिद्ध, कीड़ा, सर्प और कौआ इन सबकी चोंच, पंख और विष्ठाकी धूप दिलवानी चाहिये ॥ ३ ॥
मनोह्वा तार्क्ष्यजं चैव शकृत्पारावतस्य च ।
अञ्जनं हन्त्यपस्मारमुन्मादं च विशेषतः ॥ ४ ॥
मैनसिल, रसौंत और कबूतरकी बीठ इनको एकत्र पीसकर आंखोंमें आँजनेसे अपस्मार और विशेषकर उन्मादरोग नष्ट होता है ॥ ४ ॥
अपेतराक्षसीकुष्ठपूतनाकेशिचोरकैः ।
उत्सादनं मूत्रपिष्टैर्मूत्रैरेवावसेचनम् ॥ ५ ॥
सफेद तुलसीकी जड़, कूठ, हरड, भूतकेशी और भटेउर इन सबको समान भाग लेकर बकरेके मूत्रमें पीसकर शरीरमें मालिश करनेसे अथवा बकरेके मूत्रमें मिलाकर सेचन करनेसे अपस्मार शमन होता है ॥ ५ ॥
जतुकाशकृता तद्वद् दग्धैर्वा बस्तलोमभिः ।
अपस्मारहरो लेपो मूत्रसिद्धार्थशिग्रुभिः ॥ ६ ॥
गोमूत्रके साथ चिमगादड़की विष्ठा या बकरेके भस्म किये हुए रोम या सफेद सरसों और सहिंजनेके बीजोंको पीसकर लेप करनेसे अपस्मार दूर होय ॥ ६ ॥
यः खादेत्क्षीरभक्ताशी माक्षिकेण वचारजः ।
अपस्मारं महाघोरं स चिरोत्थं जयेद् ध्रुवम् ॥ ७ ॥
यदि दूध और भातका भोजन करनेवाला मनुष्य शहदके साथ वचके चूर्णको मिलाकर सेवन करे तो वह चिरकालोत्पन्न और महाभयंकर अपस्मारको अवश्य जीतता है ॥ ७ ॥
उल्लम्बितनरग्रीवापाशं दग्ध्वा कृता मसी ।
शीताम्बुना समं पीत्वा हन्त्यपस्मारमुद्धतम् ॥ ८ ॥
फाँसीके द्वारा मरेहुए मनुष्यकी गर्दनकी रस्सीको जलाकर स्याही बनालेवें। उस स्याहीको शीतल जलके साथ पान करनेसे अत्युग्र अपस्मार नष्ट होता है ॥ ८ ॥
प्रयोज्यं तैललशुनं पयसा वा शतावरी ।
ब्राह्मीरसश्च मधुना सर्वापस्मारभेषजम् ॥ ९ ॥
तैलके साथ लहसुन अथवा दूधके साथ शतावर या ब्राह्मीके रसको शहदके साथ सेवन करनेसे सर्व प्रकारका अपस्मार दूर होता है ॥ ९ ॥
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