भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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६१० भैषज्यरत्नावली [ अपस्मार-

निर्दह्य निर्द्रवां कृत्वा च्छागिकामरनालिकाम् । तामम्लसाधितां खादेदपस्मारमुदस्यति ॥ १० ॥ बकरीकी अमरानामक नाडीको रक्तादिसे शुद्ध करके अच्छे प्रकारसे जलाकर उसको काँजीके साथ पकाकर सेवन करनेसे अपस्मार नष्ट होता है ॥ १० ॥

अभ्यङ्गे सार्षपं तैलं बस्तमूत्रे चतुर्गुणे । सिद्धं स्याद्रोशकृन्मूत्रैः स्नानोत्सादनमेव च ॥ ११ ॥ सरसोंके तैलको चौगुने बकरेके मूत्रमें पकाकर मालिश करना अथवा गोबरको शरीरपर मलना और गोमूत्रसे स्नान व सेचन करना आदि उपचारोंसे अपस्मार दूर होता है ॥ ११ ॥

सूतभस्मप्रयोगः। शङ्खपुष्पी वचा ब्राह्मी कुष्ठमेलाग्रसैः सह । सूतभस्मप्रयोगोऽयं रक्तिकाद्वयमानतः ॥ सर्वापस्मारनाशाय महादेवेन भाषितः ॥ १२ ॥ शङ्खपुष्पी, वच, ब्राह्मी, कूट और इलायची इनके क्वाथके साथ दो दो रत्ती परिमाण पारेकी भस्मको सेवन करे । सर्वप्रकारके अपस्मारको नाश करनेके लिये श्रीमहादेवजीने इस प्रयोगको वर्णन किया है ॥ १२ ॥

इन्द्रब्रह्मवटी । मृतसृताभ्रकं तीक्ष्णं तारं ताप्यं विषं समम् । पद्मकेशरसंयुक्तं दिनैकं मर्दयेद् द्रवैः ॥ १३ ॥ स्नुह्यग्निविजयाैरण्डवचानिष्पावझरणैः । निर्गुण्ड्याश्च द्रवैर्मर्द्यं तद्गोलं पाचयेत्पुनः ॥ १४ ॥ कङ्गुनीसर्षपोत्थेन तैलेन गन्धसंयुतम् । ततः पक्त्वा समुद्धृत्य चणमात्रा वटी कृता ॥ १५ ॥ इन्द्रब्रह्मवटी नाम भक्षयेदार्द्रकद्रवैः । दशमूलकषायं च कणायुक्तं पिबेदनु ॥ अपस्मारं जयत्याशु यथा सूर्योदये तमः ॥ १६ ॥ पारेकी भस्म, अभ्रकभस्म, लौहभस्म, चाँदीकी भस्म, सोनामाखीकी भस्म, शुद्ध मीठा तेलिया और कमलकी केशर इनको समान भाग लेकर सबको एकत्र करके थूहर, चीता, भाँग, अण्ड, वच, सेम, जमाकन्द और निर्गुण्डी इनके