भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 63, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ३१
ह्रीवेरादि।
ह्रीवेरचन्दनोशीरघनपर्पटसाधितम्।
दद्यात्सुशीतलं वारि तृड्वृद्धिज्वरदाहनुत् ॥ ६३ ॥
सुगन्धवाला, लालचन्दन, खस, नागरमोथा और पित्तपापडा इनका क्वाथ बनाकर शीतल करके पीनेसे पित्तज्वर, दाह और अधिक तृषा शान्त होती है ॥ ६३ ॥
कालिङ्गादि।
कलिङ्गं कट्फलं मुस्तं पाठा कटुकरोहिणी ।
पक्वं सशर्करं पीतं पाचनं पैत्तिके ज्वरे ॥ ६४ ॥
पैत्तिकज्वरमें-इन्द्रजौ, कायफल, नागरमोथा, पाठ और कुटकी इनके क्वाथमें मिश्री मिलाकर पान करनेसे दोषोंका परिपाक होता है ॥ ६४ ॥
विश्वादि।
विश्वाम्बुपर्पटोशीरघनचन्दनसाधितम् ।
दद्यात्सुशीतलं वारि तृट्छर्दिज्वरदाहनुत् ॥ ६५ ॥
सोंठ, सुगन्धवाला, पित्तपापडा, खस, नागरमोथा और लालचन्दन—इनका शीतल क्वाथ पान करनेसे तृषा, वमन, पित्तज्वर और दाह दूर होते हैं ॥ ६५ ॥
गुडूच्यादि।
गुडूचीभूमिनिम्बश्च बालं वीरणमूलकम् ।
लघुमुस्तं त्रिवृद्धात्री द्राक्षा वासा च पर्पटः ॥ ६६ ॥
एषां क्वाथो हरत्येव ज्वरं पित्तकृतं द्रुतम् ।
सोपद्रवमपि प्रातर्निपीतो मधुना सह ॥ ६७ ॥
गिलोय, चिरायता, सुगन्धवाला, खस, अगर, नागरमोथा, निसोध, आमले, दाख, अडूसा और पित्तपापडा इनके क्वाथमें शहदको मिलाकर प्रातःकाल पान करने से सम्पूर्ण उपद्रवोंसहित पित्तज्वर शीघ्र नष्ट होता है ॥ ६६ ॥ ६७ ॥
किरातादि।
किरातामृतधन्याकचन्दनोशीरपर्पटैः ।
सपद्मकैः कृतः क्वाथो हन्ति पित्तभवं ज्वरम् ॥ ६८ ॥
चिरायता, गिलोय, धनियाँ, लालचन्दन, खस, पित्तपापडा और पद्मख इनके द्वारा बनायाहुआ क्वाथ पान करनेसे पित्तज्वर नाश होता है ॥ ६८ ॥