भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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३२भैषज्यरत्नावला ।[ चिकित्सा-

महाद्राक्षादि ।

द्राक्षाचन्दनपद्मानि मुस्ता तिक्ताऽमृताऽपि च ।
धात्री बालमुशीरं च लोध्रेन्द्रयवपर्पटाः ॥ ६९ ॥
परूषकं प्रियङ्गुश्च यवासो वासकस्तथा ।
मधुकं कुलकं चापि किरातो धान्यकं तथा ॥ ७० ॥
एषां क्वाथो निहन्त्येव ज्वरं पित्तसमुत्थितम् ।
तृष्णां दाहं प्रलापं च रक्तपित्तं भ्रमं क्लमम् ॥ ७१ ॥
मूर्च्छां छर्द्दिं तथा शूलं मुखशोषमरोचकम् ।
कासं श्वासं च हृल्लासं नाशयेन्नात्र संशयः ॥ ७२ ॥

दाख, लालचन्दन, पद्माख, नागरमोथा, कुटकी, गिलोय, आमले, सुगन्धवाला, खस, लोध, इन्द्रजौ, पित्तपापडा, फालसे, फूलप्रियंगु, जवासा, अडूसा, मुलहठी, पटोलपत्र, चिरायता और धनियाँ इनका विधिपूर्वक क्वाथ बनाकर पान करनेसे पित्तज्वर, तृषा, दाह, प्रलाप, रक्तपित्त, भ्रम, क्लम, मूर्च्छा, वमन, शूल, मुखशोष अरुचि, खाँसी, श्वास, उबकाई इत्यादि उपद्रव निश्चय दूर होते हैं ॥ ६९–७२ ॥


यवपटोल ।

पटोलयवनिष्क्वाथो मधुना मधुरीकृतः ॥ ।
तीव्रपित्तज्वरामर्दी पानात्तृड्दाहनाशकः ॥ ७३ ॥

परवल और जौ दोनोंको २ तोले लेकर आधसेर जलमें पकावे । जब पकते २ आधपाव जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उसमें ६ मासे शहद डाल-कर पान करनेसे दारुण पित्तज्वर, तृषा और दाह नाश होते हैं ॥ ७३ ॥


नागरादि ।

नागरोशीरमुस्ता च चन्दनं कटुरोहिणी ।
धान्यकानां क्वाथ एष पित्तज्वरविनाशनः ॥ ७४ ॥

सोंठ, खस, नागरमोथा, लालचन्दन, कुटकी और धनियाँ इनका क्वाथ सेवन करनेसे पित्तज्वर नष्ट होता है ॥ ७४ ॥


अमृतादि ।

अमृतापर्पटाधात्रीक्वाथः पित्तज्वरं हरेत् ।
सितारग्वधयोर्वापि काश्मर्य्यस्याथवा पुनः ॥ ७५ ॥