भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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६१६भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

तिलका तैल, घी, अदरखका रस, बिजौरेंनींबूका रस इन सबको समान भाग लेकर चूक अथवा गुड मिलाकर सेवन करनेसे कमरकी पीडा, ऊरुस्तम्भ, पृष्ठदण्डकी पीडा, गुल्म, शूल, गृध्रसी और उदावर्त ये सब रोग नष्ट होते हैं ॥ ४ ॥

पञ्चमूलीबलासिद्धं क्षीरं वातामये हितम् ॥ ५ ॥

वातरोगमें वृहत्पञ्चमूल और खिरैंटीके द्वारा सिद्ध किया हुआ दुग्ध पान करना हितकर है ॥ ५ ॥

कोष्ठगत-वातकी चिकित्सा ।

विशेषतस्तु कोष्ठस्थे वाते क्षारं पिबेन्नरः ॥ ६ ॥

कोष्ठगत वातमें विशेषकर जवाखार अथवा संग्रहणीरोगमें कहीहुई अग्निदीपक और क्षारयुक्त ओषधियाँ सेवन करनी चाहिये ॥ ६ ॥

आमाशयगत-वातकी चिकित्सा ।

आमाशयस्थे शुद्धस्य यथा रोगहरी क्रिया ।
अमाशयगते वाते च्छर्दिताय यथाक्रमम् ॥
रूक्षः स्वेदो लङ्घनं च कर्त्तव्यं वह्निदीपनम् । ७ ॥

आमाशयस्थित वातमें रोगीको प्रथम वमन और विरेचनके द्वारा शुद्ध कर पश्चात् रोगनाशक चिकित्सा करनी चाहिये । एवं वमन कराकर रूक्ष स्वेद देना, लंघन कराना, अग्निदीपक ओषधियोंका सेवन आदि क्रियायें करनी चाहिये ॥ ७ ॥

पक्वाशयगत-वातकी चिकित्सा ।

पक्वाशयगते वाते हितं स्नेहविरेचनम् ॥ ८ ॥

पक्वाशयमें वातरोगके होनेपर रोगीको अण्डीका तेल पान कराकर दस्त कराना॥

वस्त्यादिगत-वातकी चिकित्सा ।

कार्यो वस्तिगते वापि विधिर्वस्तिविशोधनः ।
त्वङ्मांसासृक्शिराप्राप्ते कुर्याच्चासृग्विमोक्षणम् ॥ ९ ॥

वस्ति ( मूत्राशय ) गत वातरोगमें मूत्राघात और अश्मरीरोगमें कही हुई विधिसे चिकित्सा करनी चाहिये । त्वचा, मांस, रुधिर और शिरागत वायुरोगमें रक्तमोक्षण कराना चाहिये ॥ ९ ॥

स्नायुसन्ध्यस्थिगत-वातकी चिकित्सा ।

स्नेहोपनाहाग्निकर्म्मबन्धनान्मर्दनानि च ।
स्नायुसन्ध्यस्थिसंप्राप्ते कुर्याद्वाते विचक्षणः ॥ १० ॥