भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा भाषाटीकासहिता । ६१७
तैल, घृतादिका सेवन, प्रलेप, अग्निकर्म, बन्धन और तेलकी मालिश आदिके द्वारा स्नायु, सन्धि और अस्थिगत वातकी चिकित्सा करनी चाहिये ॥ १० ॥
त्वग्गत-वातकी चिकित्सा ।
स्वेदाभ्यङ्गावगाहांश्च हृद्यं चान्नं त्वगाश्रिते ॥ ११ ॥
त्वचामें वातरोग होनेपर स्वेदक्रिया, तैलकी मालिश, गोता लगाकर जलमें स्नान करना और हृदयको हितकारी अन्नका भोजन आदि उपचार कराना ॥
रक्तगत-वातकी चिकित्सा ।
शीताः प्रदेहा रक्तस्थे विरेको रक्तमोक्षणम् ॥ १२ ॥
रुधिरगत वातरोगमें शीतल प्रलेप, विरेचन और रक्तमोक्षण आदिके द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये ॥ १२ ॥
मांसमेदोगत-वातकी चिकित्सा ।
विरेको मांसमेदःस्थे निरूहाः शमनानि च ॥ १३ ॥
मांस और मेदोगत वातरोगमें विरेचन, निरूहवस्ति और शमनकारक औषधियाँ प्रयोग करनी चाहिये ॥ १३ ॥
अस्थिमज्जागत-वातकी चिकित्सा ।
बाह्याभ्यन्तरतः स्नेहैरस्थिमज्जगतं जयेत् ॥ १४ ॥
अस्थि और मज्जामें स्थित वातको घृतपान और तैलादिकी मालिश आदिके द्वारा जीतना चाहिये ॥ १४ ॥
शुक्रगत- वातकी चिकित्सा ।
हृद्यान्नपानं शुक्रस्थे बलशुक्रकरं हितम् ॥ १५ ॥ विबद्धमार्गशुक्रं तु दृष्ट्वा दद्याद्विरेचनम् । सारल्यात्कोपिनो वायोर्वीर्यद्वारं हि शुध्यति ॥ १६ ॥
शुक्रस्थित वातमें हृदयको हितकारी, सुस्वादु, बलकारक, और शुक्रवर्द्धक अन्न पान सेवन करने हितकारी हैं। यदि शुक्र निकलनेका मार्ग अवरुद्ध होगया हो तो विरेचक ओषधियाँ सेवन करावे। कारण-विरेचनके द्वारा कुपित वायुके सरल होजाने से वीर्य निकलनेका मार्ग साफ होजाताहै ॥ १५ ॥ १६ ॥
शुष्कगर्भकी चिकित्सा ।
गर्भे शुष्के तु वातेन बालानां चापि शुष्यताम् । सितामधुककाश्मर्यैर्हितमुत्थापने पयः ॥ १७ ॥