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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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६१८ । भैषज्यरत्नावली । [ वातव्याधि-

वायुके द्वारा गर्भाशय अथवा गर्भस्थ सन्तानके शुष्क होजानेपर मिश्री, मुलहठी, कुम्भीर इनके साथ दूधको पकाकर गर्भिणीको पान कराना चाहिये ॥ १७ ॥

शिरोगत-वातकी चिकित्सा।

शिरोगतेऽनिले वातशिरोरोगहरी क्रिया ॥ १८ ॥
शिरमें वातरोग होनेपर वातज शिरोरोगमें कहीहुई विधिके अनुसार चिकित्सा करनी चाहिये ॥ १८ ॥

व्यादितकी चिकित्सा।

व्यादितास्ये हनुं स्विन्नमङ्गुष्ठाभ्यां प्रपीड्य च ।
प्रदेशिनीभ्यां चोन्नम्य चिबुकोन्नमनं हितम् ॥ १९ ॥
वातरोगमें मुखके फैलजानेपर गण्डस्थलोंमें स्वेद देकर अँगूठोंके द्वारा ठोडीको दबावे फिर तर्जनी और मध्यमा अँगुलीयोंके द्वारा ठोडीको ऊपरको उठावे। इस प्रकार करनेसे मुखका विकृतभाव दूर होताहै ॥ १९ ॥

अर्दितकी चिकित्सा।

रसोनकल्कं नवनीतमिश्रं खादेन्नरो योऽर्दितरोगयुक्तः ।
तस्यार्दितं नाशयतीह शीघ्रं वृन्दं घनानामिव मातरिश्वा ॥
यदि अर्दितरोगी लहसुनके कल्कको नैनीघीमें मिलाकर सेवन करे तो उसका अर्दितरोग इस प्रकार शीघ्र नाश होजाता है, जैसे वायुका वेग मेघोंके समूहको तत्काल नष्ट करदेता है ॥ २० ॥

अर्दिते नवनीतेन खादेन्माषण्डरीं नरः ।
क्षीरमांसरसैर्भुक्त्वा दशमूलीरसं पिबेत् ॥ २१ ॥
अर्दितरोगमें नैनीघीके साथ उडदकी बाडियें भक्षण करे। पश्चात् दूध और मांस-रसके साथ भोजन करके दशमूलका क्वाथ पान करे ॥ २१ ॥

स्वेदाभ्यङ्गशिरोवस्तिपाननस्यपरायणः ।
अर्दितं सजयेत्सर्पिः पिबेदौत्तरभक्तिकम् ॥ २२ ॥
अर्दितरोगमें स्वेद, तैलमर्दन, घृतपान, शिरोवस्ति और नस्य इन क्रियाओंका यथाविधि प्रयोग कर भोजनके बाद घृत पान करानेसे अर्दितरोग नष्ट हो ॥

मन्यास्तम्भकी चिकित्सा।

पञ्चमूलीकृतः क्वाथो दशमूलीकृतोऽथवा ।
रूक्षः स्वेदस्तथा नस्यं मन्यास्तम्भे प्रशस्यते ॥ २३ ॥

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