भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६१९
मन्यास्तम्भरोगमें बृहत्पञ्चमूल अथवा दशमूलका क्वाथ पान करना एवं रूक्ष स्वेद और नस्य देना चाहिये ॥ २३ ॥
ग्रीवास्तम्भकी चिकित्सा ।
कटुतैलेनाभ्यक्ते लिप्ते कल्केन वाजिगन्धायाः ।
शाम्येद्ग्रीवास्तम्भशूलं महदप्यनायासम् ॥ २४ ॥
कडुवे तेलकी मालिश और असगन्धकी जडको पानीमें पीसकर लेप करनेसे अत्यन्त प्रबल ग्रीवास्तम्भकी शूलभी सहजमें ही दूर होजाता है ॥ २४ ॥
जिह्वास्तम्भकी चिकित्सा ।
वाताद् वाग्धमनीदुष्टौ स्नेहगण्डूषधारणम् ॥ २५ ॥
वायुसे वाणीको बहानेवाली नाडीके विकृत होजानेपर वातनाशक तेल अथवा घृतके गण्डूषधारण करने चाहिये ॥ २५ ॥
कुब्जकी चिकित्सा ।
वातघ्नैर्दशमूल्या च नरं कुब्जमुपाचरेत् ।
स्नेहैर्मांसरसैर्वापि प्रवृद्धं तं विवर्जयेत् ॥ २६ ॥
वायुके द्वारा मनुष्यके शरीरमें कुब्ज (कुबडापन) होजानेपर वातनाशक भद्रदार्वादिगणकी ओषधियोंका क्वाथ या दशमूलका क्वाथ अथवा वातनाशक तैल घृतादि और मांसरस सेवन आदि उपचार करे । किन्तु बहुत पुराने स्थायी कुब्जको असाध्य जानकर छोडदेवे ॥ २६ ॥
आध्मानकी चिकित्सा ।
आध्माने लंघनं पाणितापश्च फलवर्त्तयः ।
दीपनं पाचनं चैव बस्तिश्चाप्यत्र शोधनः ॥ २७ ॥
आध्मान (अफारा) रोगमें लंघन करना; हाथको अग्निपर तपाकर स्वेद देना, फलवर्त्ति क्रिया, अग्निदीपक और पाचक ओषधियोंको प्रयोग करनी और वस्तिक्रिया करनी चाहिये ॥ २७ ॥
अष्ठीला और प्रत्यष्ठीलाकी चिकित्सा ।
प्रत्यष्ठीलाष्ठीलिकयोरन्तर्विद्रधिगुल्मवत् ॥ २८ ॥
अष्ठीला, प्रत्यष्ठीलारोगमें अन्तर्विद्रधि और गुल्मरोगकी समान चिकित्सा करनी चाहिये ॥ २८ ॥