भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ६२० | भैषज्यरत्नावली । | [ वातव्याधि- |
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गृध्रसीकी चिकित्सा ।
तैलमेरण्डजं वापि गोमूत्रेण पिबेन्नरः ।
मासमेकं प्रयोगोऽयं गृध्रस्यूरुग्रहापहः ॥ २९ ॥
अण्डीके तेलको गोमूत्रके साथ एक महीनेतक सेवन करनेसे गृध्रसी और ऊरुस्तम्भ दूर होता है ॥ २९ ॥
शेफालिकादलक्वाथो मृद्वग्निपरिसाधितः ।
दुर्वारं गृध्रसीरोगं पीतमात्रं समुद्धरेत् ॥ ३० ॥
मन्दमन्द अग्निके द्वारा सिद्ध किया हुआ निर्गुण्डीके पत्तोंका क्वाथ पान करतेहीं दुस्साध्य गृध्रसीरोगको नष्ट करता है ॥ ३० ॥
पिष्टैरण्डफलं क्षीरे सविश्वं वा फलं रुबोः।
पायसो भक्षितः सिद्धो गृध्रसीकटिशूलनुत् ॥ ३१ ॥
छिलकेरहित अण्डके बीजोंको पीसकर अथवा अण्डके बीज और सोंठको एकत्र पीसकर उनकी दूधमें खीर बनाकर भक्षण करनेसे गृध्रसी और कमरका शूल नष्ट होता है । ( इसमें अण्डके बीजोसे चौगुने चावल और चावलोंसे चौगुना दूध लेना चाहिये ) ॥ ३१ ॥
वातकण्टककी चिकित्सा ।
रक्तावसेचनं कार्य्यमभीक्ष्णं वातकण्टके ।
पिबेदेरण्डतैलं वा दहेत्सूचीभिरेव वा ॥ ३२ ॥
वातकण्टकरोगमें बारंबार रक्तमोक्षण करावे अथवा अण्डीके तेलका पान करें या गरम सुईके द्वारा व्याधिस्थानको दग्ध करे ॥ ३२ ॥
खल्लीकी चिकित्सा ।
खल्व्यां स्निग्धाम्ललवणैः स्वेदोन्मर्दपनाहनम् ॥ ३३ ॥
स्निग्ध, अम्ल और लवणयुक्त द्रव्योंके द्वारा स्वेद देना, मर्दन और प्रलेप करना आदि क्रियायें खल्ली ( एक प्रकारका कम्प ) रोगमें उपयोगी हैं ॥ ३३ ॥
शिराग्रहकी चिकित्सा ।
शिराग्रहे तु कर्त्तव्या शिरागतमरुत्क्रिया ।
दशमूलीकषायेण मातुलुङ्गरसेन च ॥
शृतेन तैलेनाभ्यङ्गः शिरोबस्तिश्च युज्यते ॥ ३४ ॥