भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६२१


शिराग्रहरोगमें शिराओंमें स्थित वायुकी वातनाशक चिकित्सा करनी चाहिये एवं दशमूलके क्वाथ और बिजौरे नींबूके रसकें साथ पकायेहुए तेलकी मालिश करना और शिरमें वस्ति ( पिचकारी ) का प्रयोग करना चाहिये ॥ ३४ ॥

अपतानककी चिकित्सा ।

अथापतानकेनार्त्तमस्रुताक्षमवेपनम् ।
अखट्वापातिनं चैव त्वरया समुपाचरेत् ॥ ३५ ॥

अपतानकरोगसे आक्रान्त रोगीकी जिसके नेत्रोंमें आँसू न निकले हों, शरीरमें कम्प न हुआ हो और वह खाटपर न पडा हो तो उसकी बहुत शीघ्र चिकित्सा करनी चाहिये । कारण, चिकित्सा में देर करनेसे रोग असाध्य होता है ॥ ३५ ॥

पक्षाघातकी चिकित्सा ।

पक्षाघातसमाक्रान्तं सुतीक्ष्णैश्च विरेचनैः ।
शोधयेद्वस्तिभिश्चापि व्याधिरेवं प्रशाम्यति ॥ ३६ ॥

पक्षाघातवाले रोगीको तीक्ष्ण औषधियोंके द्वारा विरेचन कराकर और वस्ति-क्रियाके द्वारा शोधन करे । इस प्रकार करनेसे रोग शमन होता है ॥ ३६ ॥

दशमूलीबलामाषक्वाथं तैलाज्यमिश्रितम् ।
सायं भुक्त्वा पिबेन्नस्यं विश्वाच्यामवबाहुके ॥ ३७ ॥

विश्वाची और अवबाहुक रोगमें दशमूल, खिरेंटी और उडंद इनके क्वाथको तिलका तैल और घी मिलाकर शामको भोजन करनेकें पश्चात् नासिका द्वारा पान करे ॥ ३७ ॥

अपतन्त्रककी चिकित्सा ।

अथापतन्त्रकेनार्त्तमातुरं नापतर्पयेत् ।
निरूहवस्तिवमनं सेवयेन्न कदाचन ॥ ३८ ॥
श्वसनाः कफवाताभ्यां रुद्धास्तस्य विमोक्षयेत् ।
तीक्ष्णैः प्रधमनैः संज्ञां तासु मुक्तासु विन्दति ॥ ३९ ॥

अपतन्त्रकरोगसे ग्रसित रोगीको लङ्घन, निरूहवस्ति और वमन कदापि नहीं करानी चाहिये । इसमें कफ और वायुके द्वारा श्वास प्रश्वासको बहानेवाली सब नाडियें रुक जाती हैं, इसलिये तीक्ष्ण प्रधमन क्रिया करके उनको खोलदेवे । नाडियोंके खुलजानेपर रोगी चैतन्यताको प्राप्त होता है ॥ ३८ ॥ ३९ ॥