भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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६२२भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

खञ्ज और पंगुताकी चिकित्सा ।

उपाचरेदभिनवं खञ्जं पङ्गुमथापि वा ।
विरेकास्थापनस्वेदगुग्गुलुस्नेहवस्तिभिः ॥ ४० ॥
विरेचन, निरूहवस्ति, स्वेद, गूगल और स्नेहवस्ति इन क्रियाओंके द्वारा नवीन खञ्ज और पंगु रोगीकी चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ४० ॥

क्रोष्टुशीर्षकी चिकित्सा ।

गुग्गुलुं क्रोष्टुशीर्षे तु गुडूचीत्रिफलाम्भसा ।
क्षीरेणैरण्डतैलं वा पिबेद्वा वृद्धदारकम् ॥ ४१ ॥
रसैस्तित्तिरिमांसस्य पीतैर्गुग्गुलुसंयुतैः ।
वातरक्तक्रियाभिश्च जयेज्जम्बुकमस्तकम् ॥ ४२ ॥
क्रोष्टुशीर्ष वातरोगमें गिलोय और त्रिफलेके क्वाथके साथ शुद्ध गूगल या गौके दूधके साथ अण्डीका तैल अथवा दूधके साथ विधारेका चूर्ण सेवन करना चाहिये । तीतरके मांसरसके साथ गूगलको मिलाकर पान करनेसे और वातरक्ताधिकारमें कही हुई विधिके अनुसार चिकित्सा करनेसे क्रोष्टुशीर्ष रोग नष्ट होता है ॥ ४१ ॥ ॥ ४२ ॥

कलायखञ्जकी चिकित्सा ।

क्रमः कलायखञ्जस्य खञ्जपङ्ग्वोरिव स्मृतः ।
विशेषात्स्नेहनं कर्म कार्यमत्र विचक्षणैः ॥ ४३ ॥
खञ्ज और पंगुरोगकी समान कलायखञ्जरोगकी चिकित्सा करनी । इसमें विशेषकर स्नेहकर्म अर्थात् वातनाशक तैल घृतादिका मर्दन व पान करना ॥ ४३ ॥

बाह्यान्तरायामकी चिकित्सा ।

बाह्यायामेऽन्तरायामे विधेयाऽर्दितवत्क्रिया ॥ ४४ ॥
बाह्यायाम और अन्तरायामरोगमें अर्दितरोगकी समान चिकित्सा करनी ॥ ४४ ॥

त्रिकशूलकी चिकित्सा ।

कारयेद्वालुकास्वेदं त्रिकशूले प्रयत्नतः ।
यद्वाऽधस्तात्करीषाग्निं धारयेत्सततं नरः ॥ ४५ ॥
त्रिकशूलरोगमें बालूके द्वारा विधिपूर्वक स्वेद देवे अथवा कमरके नीचे आरने उपलोंकी अग्निको रखकर बार बार सेंके ॥ ४५ ॥