भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६२३
पाददाहकी चिकित्सा ।
वातरक्तक्रमं कुर्यात्पाददाहे विशेषतः ।
मसूरविदलैः पिष्टैः शृतशीतेन वारिणा ॥ ४६ ॥
चरणौ लेपयेत्सम्यक् पाददाहप्रशान्तये ।
नवनीतेन संलिप्तौ वह्निना परितापितौ ॥
मुच्येते चरणौ क्षिप्रं परितापात्सुदारुणात् ॥ ४७ ॥
पाददाहरोगमें विशेषकर वातरक्तकी समान चिकित्सा करनी चाहिये । मसूरकी दालको पीसकर जलके साथ पकाकर शीतल होजानेपर पैरोंमें लेप करनेसे पावोंकी दाह शान्त होती है । अथवा पाँवोंमें नैनी घी लगाकर अग्निपर तपानेसे पैरोंकी दारुण दाह शीघ्र दूर होती है ॥ ४६ ॥ ४७ ॥
पादहर्षकी चिकित्सा ।
पादहर्षे तु कर्तव्यः कफवातहरो विधिः ॥ ४८ ॥
पादहर्षरोगमें कफ और वातनाशक चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ४८ ॥
दशमूलादिक्वाथ ।
दशमूलीकृतः क्वाथः पञ्चमूल्याऽपि कल्पितः ।
मन्यास्तम्भं निहन्त्याशु कम्पवातं विशेषतः ॥ ४९ ॥
दशमूल अथवा बृहत् पञ्चमूलका काढा बनाकर पान करनेसे मन्यास्तम्भ रोग और विशेषकर कम्पवातरोग शीघ्र नष्ट होता है ॥ ४९ ॥
बलादिक्वाथ ।
बलामूलशृतं तोयं सैन्धवेन समन्वितम् ।
बाहुशोषकरे वाते मन्यास्तम्भे च शस्यते ॥ ५० ॥
बाहुशोष और मन्यास्तम्भ वातरोगमें खिरेंटीकी जडका क्वाथ बनाकर उसको सैन्धानमकके साथ सेवन करना चाहिये ॥ ५० ॥
एरण्डादिक्वाथ ।
एरण्डमूलं बिल्वं च बृहती कण्टकारिका ।
कषायो रुचकोपेतः पीतो वङ्क्षणवस्तिजम् ॥
गृध्रसीजं हरेच्छूलं चिरकालानुबन्धि च ॥ ५१ ॥
अण्डकी जडकी छाल, बेलकी छाल, बडी कटेरी और कटेरी इनके काढेमें काला-नमक डालकर पान करनेसे वंक्षण और वस्तिगत शूल और पुरानी गृध्रसीका शूलरोग दूर होता है ॥ ५१ ॥