भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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३४भैषज्यरत्नावली ।[ चिकित्सा-

पित्तपापडा, अडूसा, कुटकी, चिरायता, जवासा और फूलप्रियंगु इनके क्वाथमें मिश्री मिलाकर पान करनेसे पिपासा, दाह और रक्तपित्तयुक्त पित्तज्वर दूर होता है ॥ १८० ॥

गुडूच्यादि ।

गुडूच्यामलकैर्युक्तः केवलो वापि पर्पटः ।
पित्तज्वरं हरेत्तूर्णं दाहशोथभ्रमान्वितम् ॥ ८१ ॥
गिलोय, आमले और पित्तपापडा इनका क्वाथ अथवा केवल पित्तपापडेका क्वाथ दाह, शोथ और भ्रमयुक्त पित्तज्वरको शीघ्र हरता है ॥ ८१ ॥

भूनिम्बादि ।

भूनिम्बातिविशालोध्रमुस्तकेन्द्रयवामृताः ।
बालकं धान्यकं बिल्वं कषायो माक्षिकान्वितः ॥
विड़्भेदश्वासकासांश्च रक्तपित्तज्वरं हरेत् ॥ ८२ ॥
चिरायता, अतीस, लोध, नागरमोथा, इन्द्रजौ, गिलोय, सुगन्धवाला, धनियाँ, बेलकी छाल इनके क्वाथमें शहद मिलाकर सेवन करनेसे मलभेद, श्वास, खाँसी, रक्तपित्त और ज्वर दूर होता है ॥ ८२ ॥

धन्याकक्वाथ ।

ससितो निशि पर्युषितः प्रातर्धन्याकक्वाथः ।
पीतः शमयत्यचिरादन्तर्दाहं ज्वरं पैत्तम् ॥ ८३ ॥
धनियेके बासी क्वाथको मिश्री मिलाकर प्रातःकाल पीनेसे अन्तर्दाह और पित्तज्वर शीघ्र नष्ट होता है ॥ ८३ ॥

मृद्वीकादि ।

मृद्वीका मधुकं निम्बं कटुका रोहिणी समा ।
अवश्यायस्थितं पाकमेतत्पित्तज्वरापहम् ॥ ८४ ॥
दाख, मुलहठी, नीमकी छाल और कुटकी सब ओषधियोंको समान भाग लेकर सन्ध्याके समय विधिपूर्वक क्वाथ बनावे उसको रात्रिमें ओसमें रखकर अगले दिन प्रातःकाल पान करनेसे पित्तज्वर दूर होता है ॥ ८४ ॥

दुरालभादि ।

दुरालभावासकपर्पटानां प्रियंगुनिम्बकटुरोहिणीनाम् ।
किराततिक्तं क्वथितं कषायं सशर्कराढ्यं क्वथितं च पाचनम् ।
सदाहपित्तज्वरमाशु हन्ति तृष्णाभ्रमं शोथविकारयुक्तम् ॥८५