भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 67, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ३५
धमासा, अडूसा, पित्तपापडा, फूलप्रियंगु, नीमकी छाल, कुटकी और चिरायता इनके क्वाथमें मिश्री मिलाकर पान करनेसे दाह, तृषा, भ्रम और शोथयुक्त पित्त-ज्वर शीघ्र नष्ट होता है. यह क्वाथ पाचक है ॥ ८५ ॥
त्रायमाणादि ।
त्रायमाणा च मधुकं पिप्पलीमूलमेव च ।
किराततिक्तकं मुस्तं मधूकं सविभीतकम् ॥ ८६ ॥
सशर्करं पीतमेतत्पित्तज्वरविनाशनम् ॥ ८७ ॥
त्रायमाण, मुलहठी, पीपलामूल, चिरायता, नागरमोथा, महुवेके फूल और बहे-डा इनके क्वाथको मिश्री डालकर पान करनेसे पित्तज्वर नाश होता है ॥ ८६।८७॥
कफज्वरकी चिकित्सा ।
मधुपिप्पली ।
क्षौद्रोपकुल्यासंयोगः श्वासकासज्वरापहः ।
प्लीहानं हन्ति हिक्कां च. बालानां चापि शस्यते॥ ८८ ॥
कफज्वरमें पीपलका चूर्ण और शहद मिलाकर चाटनेसे श्वास, खाँसी, कफज्वर, प्लीहा, हिचकी आदि उपद्रव नष्ट होते हैं । यह योग बालकोंके लिये भी हितकारी है ॥ ८८ ॥
चतुर्भद्रावलेह ।
कट्फलं पौष्करं शृङ्गी कृष्णा च मधुना सह ।
श्वासकासज्वरहरः श्रेष्ठो लेहः कफान्तकृत् ॥ ८९ ॥
ऊर्द्धजत्रुरोगघ्नी सायं स्यादवलेहिका ।
अधोरोगहरी या तु सा पूर्वं भोजनान्मता ॥ ९० ॥
कायफल, पोहकरमूल, काकडासिंगी और पीपल इनके समानभाग चूर्णको शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे श्वास, खाँसी और कफज्वर दूर होता है । ऊर्ध्वज-त्रुरोगवाला मनुष्य इस अवलेहको सायङ्कालमें और अधोजत्रुगत रोगी प्रातःकाल भोजनसे पहले सेवन करे तो उक्तरोग शीघ्र नष्ट होते हैं ॥ ८९-९० ॥
सिन्धुवारक्वाथ ।
सिन्धुवारदलक्वाथं सोषणं कफजे ज्वरे ।
जङ्घयोश्च बले क्षीणे कर्णे वा पिहिते पिबेत् ॥ ९१ ॥