भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३६ ) भैषज्यरत्नावली । चिकित्सा-
कफजन्यज्वरमें-जंघाओंमें दुर्बलता और श्रवणशक्तिके ह्रास होनेपर सिंहालूके पत्तोंके क्वाथमें काली मिरचोंका चूर्ण डालकर पान करनेसे लाभ होता है ॥ ९१ ॥
सप्तच्छदादि ।
सप्तच्छदं गुडूचीं च निम्बस्फूर्जकमेव च ।
क्वाथयित्वा पिबेत्क्वाथं सक्षौद्रं कफजे ज्वरे ॥ ९२ ॥
सतौनेकी छाल, गिलोय, नीमकी छाल और तेंदूकी छाल इनका विधिपूर्वक क्वाथ बनाकर उसमें शहद डालकर पान करनेसे कफज्वर दूर होता है ॥ ९२ ॥
वासादि ।
वासाक्षुद्रामृताक्वाथः क्षौद्रेण ज्वरकासहृत् ॥ ९३ ॥
अडूसा कटेरी और गिलोय इनके क्वाथमें शहद मिलाकर पान करनेसे ज्वर और खाँसी दूर होती है ॥ ९३ ॥
निम्बादि ।
निम्बविश्वामृतादारुशठीभूनिम्बपौष्करम् ।
पिप्पल्यौ बृहती चेति क्वाथो हन्ति कफज्वरम् ॥ ९४ ॥
नीमकी छाल, सोंठ, गिलोय, देवदारु, कचूर, चिरायता, पोहकरमूल, पीपल, बडी पीपल और बडी कटेरी इनका क्वाथ कफज्वरको नष्ट करता है ॥ ९४ ॥
मरिचादि ।
मरिचं पिप्पलीमूलं नागरं कारवी कणा ।
चित्रकं कट्फलं कुष्ठं वसुगन्धि वचा शिखा ॥ ९५ ॥
कण्टकारी जटा शृङ्गी यमानी पिचुमर्दकः ।
एषां क्वाथो हरत्येष ज्वरं सोपद्रवं कफम् ॥ ९६ ॥
काली मिरच, पीपलामूल, सोंठ, काला जीरा, पीपल, चीता, कायफल, कूठ, नागरमोथा, वच, हरड, कटेरी, बालछड, काकडासिंगी, अजवायन और नीमकी छाल इनका क्वाथ पान करनेसे सम्पूर्ण उपद्रवोंसहित कफज्वर नष्ट होता है ॥ ९५ ॥ ९६ ॥
त्रिफलादि ।
त्रिफलापटोलवासाच्छिन्नसहातिक्तरोहिणीषड्ग्रन्थाः ।
मधुना श्लेष्मसमुत्थे दशमूलीवासकस्य वा क्वाथः ॥ ९७ ॥