भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहितः । ६२९
शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, हरड, हरताल, शुद्ध मीठा तेलिया, कुटकी, सोंठ, मिरच, पीपल, बोल और जमालघोटा इन सबको समान भाग लेकर भाँगरके रस, थूहरके दूध और आकके दूधके साथ क्रमसे एकएक दिनतक खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। इसकी प्रतिदिन एक एक गोली सेवन करनेसे हृदयका शूल, पसलीकी पीडा, आमवात आदि सर्वप्रकारके वातरोग और कमरकी पीडा नाश होती है। यह रस अग्निको अत्यन्त दीपन करता और स्थूलताको दूर करता है ॥७८-८०॥
सर्वाङ्गकम्पारिरस ।
मृतं सूतं मृतं ताम्रं मर्दयेत्कटुकद्रवैः ।
एकविंशतिवारं च शोष्यं पेष्यं पुनःपुनः ॥
चणमात्रा वटी भक्ष्या रसः सर्वाङ्गकम्पजित् ॥ ८१ ॥
शुद्ध पारे और ताँबेकी भस्मको समान भाग लेकर कुटकीके क्वाथमें इक्कीस बार भावना देकर सुखालेवे। फिर पीसकर इसकी चनेकी बराबर गोली बनाकर भक्षण करनेसे सर्वाङ्गगत कम्पवात नष्ट होता है ॥ ८१ ॥
चिन्तामणिरस ।
कर्षैकं रससिन्दूरं तत्समं मृतमभ्रकम् ।
तदर्द्धं मृतलौहं च स्वर्णं शाणं क्षिपेद् बुधः ॥ ८२ ॥
कन्यारसेन सम्मर्द्य गुञ्जामात्रां वटीं चरेत् ।
अनुपानादिकं दद्याद् बुद्ध्वा दोषबलाबलम् ॥ ८३ ॥
रससिन्दूर और अभ्रकभस्म ये प्रत्येक दो दो तोले, लोहभस्म एक तोला और सुवर्णभस्म ४ मासे इन सबको घीगुआरके रसमें खरल करके एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। इस वटीको दोषोंका बलाबल विचारकर यथोचित अनुपानके साथ सेवन करावे ॥ ८२ ॥ ८३ ॥
हन्ति श्लेष्मान्वितं वातं केवलं पित्तसंयुतम् ।
हृल्लासमरुचिं दाहं वान्तिं भ्रान्तिं शिरोग्रहम् ॥ ८४ ॥
प्रमेहं कर्णनादं च ज्वरगद्गदमूकताम् ।
बाधिर्यं गर्भिणीरोगमश्मरीं सूतिकामयम् ॥ ८५ ॥
प्रदरं सोमरोगं च यक्ष्माणं ज्वरमेव च ।
बलवर्णाग्निदः सम्यक् कान्तिपुष्टिप्रसाधकः ।
चिन्तामणिरसश्चायं चिन्तामणिरिवापरः ॥ ८६ ॥