भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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६३० भैषज्यरत्नावली। [ वातव्याधि -

यह चिन्तामणिनामक रस कफसहित वात, केवल वात और पित्तयुक्त वात, एवं हृल्लास, अरुचि, दाह, वमन, भ्रान्ति, शिरःपीडा, प्रमेह, कर्णनाद, ज्वर, गद्गदता, मूकता, बहरापन, गर्भिणीके रोग, पथरी, प्रसूतिरोग, प्रदर, सोमरोग, राजयक्ष्मा, और सर्वप्रकारके ज्वरको नष्ट करता है । एवं बल, वर्ण और अग्निकी वृद्धि, कान्ति और पुष्टिको उत्पन्न करनेवाला है । यह चिन्तामणिरस दूसरी चिन्तामणिकी समान है ॥ ८४-८६ ॥

चिन्तामणिचतुर्मुख ।

विशुद्धं रससिन्दूरं तदर्द्धं लोहमभ्रकम् ।
तदर्द्धं कनकं खल्वे कन्यास्वरसमर्दितम् ॥ ८७ ॥
एरण्डपत्रैरावेष्ट्य धान्यराशौ निधापयेत् ।
त्रिदिनान्ते समुद्धृत्य सर्वरोगेषु योजयेत् ॥ ८८ ॥

शुद्ध रससिन्दूर दो तोले, लोहभस्म १ तोला, अभ्रकभस्म एक तोला और सुवर्णभस्म ६ मासे इन सबको एकत्र घीकुँआरके रसमें खरल करके अण्डके पत्तोंसे लपेटकर धानोंकी राशिमें रखदेवे । फिर तीन दिनके बाद निकालकर उसको सर्वप्रकारके रोगोंमें प्रयोग करे ॥ ८७-८८ ॥

एतद्रसायनवरं त्रिफलामधुसंयुक्तम् ।
तद्यथाग्निबलं खादेद्वलीपलितनाशनम् ॥ ८९ ॥
अपस्मारं महोन्मादं रोगान् वातसमुद्भवान् ।
क्रमेण शीलितं हन्ति वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ॥ ९० ॥

इस उत्तम रसायनको अग्निका बलाबल विचारकर यथोचित मात्रासे त्रिफलेके रस और शहदके साथ मिलाकर सेवन करनेसे वली और पलितरोग नाश होते हैं । एवं अपस्मार महोन्माद और वातजनित समस्त रोगोंको यह रस इस प्रकार नष्ट करदेता है जैसे इन्द्रका वज्र वृक्षको नाश करदेता है ॥ ८९ ॥ ९० ॥

बृहद्वातचिन्तामणि ।

भागत्रयं स्वर्णभस्म द्विभागं रौप्यमभ्रकम् ।
लौहात्पंच प्रवालं च मौक्तिकं त्रयसम्मितम् ॥ ९१ ॥
भस्मसूतं सप्तकं च कन्यारसविमर्दितम् ।
वल्लमात्रा वटी कार्या भिषग्भिः परियत्नतः ॥ ९२ ॥