भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६३३
विशुद्धं मौक्तिकं चैव वङ्गं च तत्समं मतम् । कुमारिकारसैर्भाव्यं धान्यराशौ दिनत्रयम् ॥ १०७ ॥ ततो रक्तिद्वयमितां वटीं कुर्याद्विचक्षणः । योगवाही रसो ह्येष सर्वरोगकुलान्तकः ॥ १०८ ॥
शुद्ध रससिन्दूर २ तोले एवं सुवर्णभस्म, लोहभस्म, अभ्रकभस्म, मोतीकी भस्म और वङ्गभस्म इन सबको एक एक तोला लेकर घीकुँवारके रसमें खरल करके तीन दिनतक धानोंकी राशिमें रक्खे। फिर उसको निकालकर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। यह योगवाही रस सर्व प्रकारके रोगोंको समूल नष्ट करता है ॥ १०६-१०८ ॥
वातपित्तभवान् रोगान्प्रमेहान्बहुमूत्रताम् । मूत्राघातमपस्मारं भगन्दरगुदामयान् ॥ १०९ ॥ उन्मादं मूर्च्छा यक्ष्माणं पक्षाघातं हतेन्द्रियम् । शूलामॢपित्तकं हन्ति भास्करस्तिमिरं यथा ॥ ११० ॥ त्रिफलारसयोगेन शुभया सितयाऽपि वा । भक्षयित्वा भवेद्रोगी कामरूपी सुदर्शनः ॥ १११ ॥ रात्रौ सेव्यं गवां क्षीरं कृशानां च विशेषतः । योगेन्द्राख्यो रसो नाम्ना कृष्णात्रेयेण निर्मितः ॥ ११२ ॥
एवं वातज, पित्तज रोग, प्रमेह, बहुमूत्रता, मूत्राघात, अपस्मार, भगन्दर, गुदाके रोग, उन्माद, मूर्च्छा, राजयक्ष्मा, पक्षाघात, इन्द्रियका नष्ट होजाना, सर्व प्रकारके शूल और अम्लपित्तादि रोगोंको इस प्रकार नष्ट करता है जैसे सूर्य अन्धकारको नष्ट कर देता है। इस रसको प्रतिदिन त्रिफलेके क्वाथ और शहदके साथ अथवा मिश्रीके साथ भक्षण करके रात्रिमें काली गौका दूध पीनेसे रोगी कामदेवकी समान कान्तिमान् होता है। इस योगेन्द्रनामक रसको कृष्णात्रेयजीने निर्माण किया है॥ १०९-११२॥
वातारिरस ।
रसभागो भवेदेको द्विगुणो गन्धको मतः । त्रिगुणा त्रिफला ग्राह्या चतुर्भागं तु चित्रकम् ॥ ११३ ॥ गुग्गुलोः पञ्च भागाः स्यू रुबूतैलेन मर्दयेत् । क्षित्त्वाऽत्र पूर्व्वकं चूर्णं पुनस्तेनैव मर्दयेत् ॥ ११४ ॥