भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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६३४ | भैषज्यरत्नावली । | [ वातव्याधि-

गुडिकां कर्षमात्रां तु भक्षयेत्प्रातरुत्थितः ।
नागरैरण्डमूलानां क्वाथं प्रपिबेदनु ॥ ११५ ॥
अभ्यज्यैरण्डतैलेन स्वेदयेत्पृष्ठदेशकम् ।
विरेके तेन सञ्जाते स्निग्धमुष्णं च भोजयेत् ॥ ११६ ॥
वातारिसंज्ञको ह्येष रसो निर्वातसेवितः ।
मासेन मरुतो रोगान् हरेत्सुरतवर्जितः ॥ ११७ ॥

शुद्ध पारा एक भाग और शुद्ध गन्धक दो भाग लेकर दोनोंकी कज्जली करलेवे। फिर गूगलको पांच भाग लेकर अण्डीके तैलके साथ खरल करके उसके साथ पूर्वोक्त कज्जली एवं त्रिफलेका चूर्ण तीन भाग और चीतेकी जडका चूर्ण चार भाग मिलाकर फिर अण्डीके तैलमें खरल करे। पश्चात् एक कर्षकी गोलियाँ बनाकर प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक गोली सेवन करे। ऊपरसे सोंठ और अण्डकी जडका क्वाथ पान करे। प्रातःकाल औषध सेवन करनेके पश्चात् रोगीकी पीठमें अण्डीका तैल मलकर स्वेद देवे। इसके द्वारा विरेचन होजानेपर स्निग्ध और उष्ण पदार्थोंका भोजन करावे। स्त्रीप्रसंगको त्यागकर इस वातारिनामक रसको वायुरहित स्थानमें रहता हुआ मनुष्य एक मासपर्यन्त सेवन करे, यह रस सर्वप्रकारके वातरोगोंको दूर करता है ॥ १३-१७ ॥

अनिलारिरस ।

रसेन गन्धं द्विगुणं विमर्द्य वातारिनिर्गुण्डिरसैर्दिनैकम् ।
निवेशयेत्ताम्रमये पुटे तत्सर्वं मृदाऽऽवेष्ट्य च वालुकाख्ये ॥ ११८
यन्त्रे पुटेद्गोमयचूर्णवह्नौ स्वभावशीते तु समुद्धरेत्तत् ।
निर्गुण्डिकावातहराग्नितोयैः सञ्चूर्ण्य यत्नेन विभावयेत्तत् ॥
रसोऽनिलारिः कथितोऽस्य वल्लमेरण्डतैलेन ससैन्धवेन ।
मरीचचूर्णेन ससर्पिषा वा निर्गुण्डिचित्रैश्च कटुत्रिकैर्वा ॥ १२०

शुद्ध पारा १ तोला और शुद्ध गन्धक २ तोले लेकर दोनोंको अण्डकी जड और निर्गुण्डीके रसके साथ एक एक दिनतक खरल करे। फिर उसको ताँबेके पात्रमें बन्द करके मिट्टीसे ल्हेंसकर वालुकायन्त्रमें रख आरने उपलोंकी अग्निमें एक प्रहरतक पकावे। जब उत्तम प्रकारसे पककर स्वयं शीतल होजाय तब उसको निकालकर निर्गुण्डी, अण्ड और चीता इनके रसमें क्रमसे एक एक बार भावना देकर दो अथवा तीन रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। इसको अण्डीके तैल और सैन्धा-

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