भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६३५

नमकके चूर्णके साथ या मिरचोंके चूर्ण और घीके साथ अथवा त्रिकुटेके चूर्ण, निर्गुण्डी और चीतेके क्वाथके साथ सेवन करे । इसको अनिलारि ( वातनाशक ) रस कहते हैं ॥ १८-१२० ॥

सर्वाङ्गसुन्दररस ।

शुद्धसूताभ्रताम्रायोहिङ्गुलं कर्षिकं मतम् ।
गन्धकश्चैकभागः स्यात्सर्वमेकत्र मर्दयेत् ॥ २१ ॥
सप्तपर्णार्कस्नुक्क्षीरवासावातारिवारिणा ।
विषमुष्टिसमं सर्वं पेष्यं तद्गोलकीकृतम् ॥ २२ ॥
विपचेद्वालुकायन्त्रे द्वियामान्ते समुद्धरेत् ।
पिप्पलीविषसंयुक्तो रसः सर्वाङ्गसुन्दरः ॥
सर्ववातविकारघ्नः सर्वशूलनिषूदनः ॥ २३ ॥

शुद्ध पारा, अभ्रकभस्म, ताम्रभस्म, लोहभस्म और सिंगरफ ये प्रत्येक दो दो तोले और शुद्ध गन्धक एक तोला लेकर सबको एकत्रकर सतौना, आक, थूहरका दूध, अडूसा और अण्डके क्वाथम भावना देवे । फिर सब औषधकी बराबर कुचला मिलाकर खरल करक गोलासा बनालेव । उस गोलेको वालुकायन्त्रमें रखकर दो प्रहरतक पकावे । पककर शीतल होजानेपर उसमें पीपलका चूर्ण और शुद्ध मीठा तेलिया दो दो तोले मिलादेवे । यह सर्वांगसुन्दर रस सर्व प्रकारके वायुके विकार और सर्व प्रकारके शूलरोगको नष्ट करता है ॥ २१-२३ ॥

शीतारिरस ।

रसेन गन्धं द्विगुणं प्रगृह्य पुनर्नवाग्निस्र्वसैर्विभाव्य ।
पक्काकपत्रस्य रसेन पश्चाद्विपाचयेदष्टगुणेन यत्नात् ॥ २४ ॥
रसाद्र्धभागं च विषं च दत्त्वा विपाचयेद्वह्निजले क्षण तत् ।
शीतारिसंज्ञस्य रसायनस्य वल्लं च सार्द्धं मरिचार्द्रकेण ॥ २५॥
मरीचचूर्णेन घृताप्लुतेन सेवेत मांसं च घृतं च पथ्यान् ॥२६॥

शुद्ध पारा एक तोला और शुद्ध गन्धक दो तोले दोनोंको पुनर्नवा और चीतेके स्वरसमें भावना देकर पके हुए आकके पत्तोंके अठगुने रसके साथ वालुकायन्त्रमें रखकर यत्नपूर्वक पकावे । पश्चात् पारेसे आधा शुद्ध मीठा तेलिया डालकर चीतेके रसमं क्षणभरतक पकावे । इस शीतारिनामक रसायनको डेढ वा दो रत्ती परिमाण देकर मिरचोंके चूर्ण और अदरकके रसके साथ अथवा मिरचोंके चूर्ण और घृतके