भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६३७

हन्यात्पूर्वाङ्गशूलं च मन्यास्तम्भं तथैव च ।
ज्वरे चैवातिसारे च शूलरोगे त्रिदोषजे ॥ ३४ ॥
पथ्यं रोगानुसारेण देयमस्मिन् भिषग्वरैः ।
श्रीमत्ता नन्दिनाथेन वातविध्वंसनो रसः ॥ ३५ ॥

इस प्रकार सिद्ध किया हुआ यह रस उदरके सब विकार, मलका अवरोध, आध्मान, आनाह, विषूचिका, मन्दाग्नि, समस्त आमदोष, गुल्म, दुर्जय वमन, संग्रहणी, श्वास, खाँसी, विशेषकर कृमिरोग, पूर्वांग व सर्वांगशूल, मन्यास्तम्भ, ज्वर, अतिसार और त्रिदोषज शूलरोग इन सम्पूर्ण रोगोंको नष्ट करताहै। इसमें रोगके अनुसार पथ्य देना चाहिये । इस वातविध्वंसन रसको श्रीमान् नन्दिनाथने निर्माण कियाहै ॥ २९=३५ ॥

वातनाशनरस ।

सूतहाटकवज्राणि ताम्रं लौहं च माक्षिकम् ।
तालं नीलाञ्जनं तुत्थं सिन्धुफेनं समांशिकम् ॥ ३६ ॥
पञ्चानां लवणानां च भागैकं सुविमर्दयेत् ।
वज्रीक्षीरैर्दिनैकं तु रुद्ध्वा तं भूधरे पचेत् ॥
माषैकमार्द्रकद्रावैर्लिह्याद्वातविनाशनम् ॥ ३७ ॥
पिप्पलीमूलकक्वाथं सकृष्णमनुपाययेत् ॥
सर्वान्‍वातविकारांश्च निहन्त्याक्षेपकादिकान् ॥ ३८ ॥

शुद्ध पारा, सुवर्णभस्म, हीराभस्म, ताम्रभस्म, लोहभस्म, सोनामाखीकी भस्म, हरताल, नीलासुरमा, नीलाथोथा और समुद्रफेन ये प्रत्येक समान भाग और पाँचों नमक एक भाग लेकर सबका एकत्र चूर्ण करलेवे । उस चूर्णको थूहरके दूधके साथ एक दिनतक खरल करके भूधरयन्त्रमें रखकर पकावे । इस रसको प्रतिदिन एक एक माशे परिमाण लेकर अदरखके रस और शहदके साथ मिलाकर सेवन करे और औषधिसेवन करनेके पश्चात् पीपलका चूर्ण डालकर पीपलामूलका क्वाथ पान करे । यह रस आक्षेपकादि सम्पूर्ण वातविकारोंको दूर करता है ॥ ३६-३८ ॥

वातकण्टकरस ।

वज्रं मृताभ्रहेमार्कतीक्ष्णमुण्डं क्रमोत्तरम् ।
मरिचं मर्दयेदम्लवर्गेण दिवसत्रयम् ॥ ३९ ॥