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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६३७

हन्यात्पूर्वाङ्गशूलं च मन्यास्तम्भं तथैव च ।
ज्वरे चैवातिसारे च शूलरोगे त्रिदोषजे ॥ ३४ ॥
पथ्यं रोगानुसारेण देयमस्मिन् भिषग्वरैः ।
श्रीमत्ता नन्दिनाथेन वातविध्वंसनो रसः ॥ ३५ ॥

इस प्रकार सिद्ध किया हुआ यह रस उदरके सब विकार, मलका अवरोध, आध्मान, आनाह, विषूचिका, मन्दाग्नि, समस्त आमदोष, गुल्म, दुर्जय वमन, संग्रहणी, श्वास, खाँसी, विशेषकर कृमिरोग, पूर्वांग व सर्वांगशूल, मन्यास्तम्भ, ज्वर, अतिसार और त्रिदोषज शूलरोग इन सम्पूर्ण रोगोंको नष्ट करताहै। इसमें रोगके अनुसार पथ्य देना चाहिये । इस वातविध्वंसन रसको श्रीमान् नन्दिनाथने निर्माण कियाहै ॥ २९=३५ ॥

वातनाशनरस ।

सूतहाटकवज्राणि ताम्रं लौहं च माक्षिकम् ।
तालं नीलाञ्जनं तुत्थं सिन्धुफेनं समांशिकम् ॥ ३६ ॥
पञ्चानां लवणानां च भागैकं सुविमर्दयेत् ।
वज्रीक्षीरैर्दिनैकं तु रुद्ध्वा तं भूधरे पचेत् ॥
माषैकमार्द्रकद्रावैर्लिह्याद्वातविनाशनम् ॥ ३७ ॥
पिप्पलीमूलकक्वाथं सकृष्णमनुपाययेत् ॥
सर्वान्‍वातविकारांश्च निहन्त्याक्षेपकादिकान् ॥ ३८ ॥

शुद्ध पारा, सुवर्णभस्म, हीराभस्म, ताम्रभस्म, लोहभस्म, सोनामाखीकी भस्म, हरताल, नीलासुरमा, नीलाथोथा और समुद्रफेन ये प्रत्येक समान भाग और पाँचों नमक एक भाग लेकर सबका एकत्र चूर्ण करलेवे । उस चूर्णको थूहरके दूधके साथ एक दिनतक खरल करके भूधरयन्त्रमें रखकर पकावे । इस रसको प्रतिदिन एक एक माशे परिमाण लेकर अदरखके रस और शहदके साथ मिलाकर सेवन करे और औषधिसेवन करनेके पश्चात् पीपलका चूर्ण डालकर पीपलामूलका क्वाथ पान करे । यह रस आक्षेपकादि सम्पूर्ण वातविकारोंको दूर करता है ॥ ३६-३८ ॥

वातकण्टकरस ।

वज्रं मृताभ्रहेमार्कतीक्ष्णमुण्डं क्रमोत्तरम् ।
मरिचं मर्दयेदम्लवर्गेण दिवसत्रयम् ॥ ३९ ॥

६३८भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

द्विक्षारं पञ्चलवणं मर्दितं स्यात्समं समम् ।
ततो निर्गुण्डिकाद्रावैर्मर्दयेद्दिवसत्रयम् ॥ ४० ॥
शुद्धमेतद्विचूर्ण्याथ विषं चास्याष्टमांशतः ।
टङ्कणं विषतुल्यांशं दत्त्वा जम्बीरकद्रवैः ।
भावयेद्दिनमेकं तु रसोऽयं वातकण्टकः ॥ ४१ ॥

हीरा १ भाग, अभ्रक २ भाग, सुवर्ण ३ भाग, तांबा ४ भाग, तीक्ष्णलोह ५ भाग, मुण्डलोह ६ भाग और कालीमिरच ७ भाग इन सब ओषधियोंको एकत्रकर अम्लवर्गकी ओषधियोंके द्वारा ३ दिनतक खरल करे । फिर उसमें सज्जी, जवाखार, पाँचोंनमक ये प्रत्येक समान भाग मिलाकर निर्गुण्डीके रसमें तीनदिन खरल करे । फिर ओषधिको सुखाकर और चूर्ण करके समस्त औषधका आठवाँ भाग शुद्ध मीठा तेलिया और विषकी बराबर सुहागा मिलाकर जम्बीरी नींबूके रसमें एक दिनतक भावना देवे । इस प्रकार यह वातकण्टकरस सिद्ध होता है ॥ ३९-४१ ॥

दातव्यो वातरोगेषु सन्निपाते विशेषतः ॥ ४२ ॥
द्विगुञ्जमार्द्रकद्रावैर्घृतैर्वा वातरोगिणे ।
निर्गुण्डीमूलचूर्णं तु महिषाक्षं च गुग्गुलुम् ॥ ४३ ॥
समांशं मर्दयेदाज्ये तद्वटी कर्षसम्मिता ।
अनुयोज्या घृतैर्नित्यं स्निग्धमुष्णं च भोजयेत् ॥ ४४ ॥
मण्डलं नाशयेत्सर्वं वातरोगं विशेषतः ।
सन्निपाते पिबेच्चानु तालमूलीकषायकम् ॥ ४५ ॥

सर्वप्रकारके वातरोगोंमें यह रस दो दो रत्ती प्रमाण लेकर अदरखके रस अथवा गोघृतके साथ वातरोगीको सेवन करावे । औषध सेवन करनेके पश्चात् निर्गुण्डीकी जडका चूर्ण और भैंसिया गूगल इनको समान भाग लेकर घीमें खरल करके एक एक कर्षकी गोलियाँ बनाकर प्रतिदिन एक एक गोली घृतके साथ मिलाकर सेवन करनी चाहिये और इसपर स्निग्ध और उष्ण पदार्थोंका भोजन करे । इसके द्वारा शरीरके चकत्ते और सम्पूर्ण वातरोग दूर होते हैं । सन्निपातमें इस रसको सेवन कर ऊपरसे मुसलीका क्वाथ पान करे ॥ ४२-४५ ॥

त्रैलोक्यचिन्तामणिरस ।

हीरं सुवर्णं सुमृतं च तारमेषां समं तीक्ष्णरजश्चतुर्णाम् ।
समं मृताभ्रं रससिन्दुरं च निष्पिष्टतीक्ष्णस्य तथाऽश्मनो वा ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६३९

खल्वे द्रवेणैव कुमारिकाया गुञ्जाप्रमाणां वटिकां प्रकुर्यात् । त्रैलोक्यचिन्तामणिरेष नाम्ना संपूज्य सम्यग्गिरिजां दिनेशम् ॥ हन्त्यामयान् योगशतैर्विवर्ज्यामयप्रणाशाय मुनिप्रणीतः । अस्य प्रसादेन गदानशेषान् जरां विनिर्जित्य सुखं विभाति ॥

हीरा, सुवर्ण, मोती और लोहा इन चारोंकी भस्म एक एक तोला, अभ्रकभस्म चार तोले और रससिन्दूर चार तोले इन सबको लोहेके अथवा पत्थरके खरलमें एकत्र करके घीकुँआरके रसके साथ उत्तम प्रकारसे खरल कर एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इस त्रैलोक्यचिन्तामणिनामक रसको प्रतिदिन प्रातःकाल पार्वती और सूर्यनारायणका यथाविधि पूजन कर सेवन करे । सैकड़ों प्रयोगोंके करनेसे भी जो दूर न हुए हों ऐसे रोगोंको नष्ट करनेके लिये मुनियोंने इस रसको निर्दिष्ट किया है । इसके प्रभावसे मनुष्य सम्पूर्ण रोगों और वृद्धताको जीतकर सुख भोगता है ॥ ४६-४८ ॥

स्निग्धे श्लेष्मण्यार्द्रकस्य रसेन पाययेत्सुधीः । शुष्के च माक्षिकेणैव पित्ते घृतसितायुतम् ॥ ४९ ॥ श्लेष्मणि मारुते सम्यग्दुष्टे च समतां गते । कणाचूर्णं क्षौद्रयुतं प्रमेहे दुग्धसंयुतम् ॥ १५० ॥ बलवर्णाग्निजननः कासघ्नः कफवातजित् । आयुःपुष्टिकरो वृष्यः सर्वरोगनिषूदनः ॥ १५१ ॥

बुद्धिमान् वैद्य इस रसको कफकी तरल अवस्थामें अदरखके रसके साथ, कफके शुष्क होनेपर शहदके साथ, पित्ताधिक्यमें घी और मिश्रीके साथ, कफका प्रकोप होनेपर एवं वायुकी समान अवस्थामें पीपलके चूर्ण और शहदके साथ और प्रमेहरोगमें दूधके साथ सेवन करावे । यह रस बल, वर्ण और अग्निको उत्पन्न करता एवं खाँसी, कफ और वातको दूर करता है । एवं आयुर्वर्द्धक, पुष्टिकारक, वृष्य और सब रोगोंका नाश करनेवाला है ॥ ४९-१५१ ॥

[ “तारशब्देनात्र शुद्धमौक्तिकमेवोच्यते नतु रजतम् ।
सममिति समभागं, चतुर्णां समं मृताभ्रम्, केषाञ्चिन्मते
रससिन्दूरस्थाने स्वर्णसिन्दूरं देयमिति ॥” ]

। “यहाँ तारशब्दसे शुद्ध मोती कहागया है, चाँदी नहीं । ‘समम्’ शब्दसे चारों भस्म समान भाग और चारोंकी बराबर अभ्रक भस्म लेवे । किसी २ के मतमें

६४० भैषज्यरत्नावली । [ वातव्याधि-

रससिन्दूरकी जगह स्वर्णसिन्दूर डालना चाहिये । हीरेके अभावमें वैक्रान्तमणि अथवा पीली कौडीकी भस्म लेनी चाहिये । ]

स्वल्परसोनपिण्ड ।

पलमर्द्धपलं चैव रसोनस्य सुकुट्टितम् ।
हिङ्गुजीरकसिन्धूत्थैः सौवर्चलकटुत्रिकैः ॥ ५२ ॥
चूर्णितैर्माषकोन्मानैरवचूर्ण्य विलोडितम् ।
यथाग्नि भक्षितं प्रातारुबुक्वाथानुपानतः ॥ ५३ ॥
दिनेदिने प्रयोक्तव्यं मासमेकं निरन्तरम् ।
वातरोगं निहन्त्याशु अर्दितं सापतन्त्रकम् ॥ ५४ ॥
एकाङ्गरोगिणे चैव तथा सर्वाङ्गरोगिणे ।
ऊरुस्तम्भे च गृध्रस्यां कृमिदोषे विशेषतः ।
कटीपृष्ठामयं हन्यादुदरं च विनाशयेत् ॥ ५५ ॥

छिल्के आदिसे रहित और शुद्ध लहसनको ६ तोले लेकर कूटलेवे । फिर उसमें हींग, जीरा, सेंधानमक, कालानमक और त्रिकुटा ये प्रत्येक एक-एक माशे परिमाण बारीक चूर्णकर मिलादेवे । इसको प्रतिदिन प्रातःकाल अग्निके बलानुसार उपयुक्त मात्रासे अण्डके क्वाथके साथ एक महीनेतक सेवन करे । यह रसोनपिण्ड वातरोग, अर्दित, अपतन्त्रक, एकाङ्गरोग, सर्वाङ्गरोग, उरुस्तम्भ, गृध्रसी, कृमिरोग, विशेषकर कमर व पीठकी पीडा और सब प्रकारके उदररोगोंको नष्ट करता है ॥५२-५५॥

त्रयोदशाङ्गगुग्गुलु ।

आभाऽश्वगन्धा हबुषा गुडूची शतावरी गोक्षुरवृद्धदारम् ।
रास्ना शताह्वा सशठी यमानी सनागरा चेति समैश्च चूर्णम् ॥
तुल्यं भवेत्कौशिकमत्र मध्ये देयं तथा सर्पिरथार्द्धभागम् ॥५६

आभा ( बबूरकी फली ), असगन्ध, हाऊबेर, गिलोय, शतावर, गोखुरू, विधा-रेके बीज, रायसन, सौंफ, कचूर, अजवायन और सोंठ, इन प्रत्येक औषधिका चूर्ण समान भाग और सम्पूर्ण चूर्णकी बराबर गूगल और गूगलसे आधा गौका घी लेकर सबको एकत्र उत्तम प्रकारसे खरल करके शुद्ध पात्रमें भरकर रखदेवे ॥

सार्द्धाक्षमात्रं तु ततः प्रयोगात्कृत्वाऽनुपानं सुरयाथ यूषैः ।
मद्येन वा कोष्णजलेन वाथ क्षीरेण वा मांसरसेन वापि ॥५७

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६४१


कटीग्रहे गृध्रसि बाहुपृष्ठे हनुग्रहे जानुनि पादयुग्मे ।
सन्धिस्यिते चास्थिगते च वाते मज्जाश्रिते स्नायुगते च कुष्ठे ॥
रोगाञ्जयेद्वातकफानुविद्धान् वातेरितान्हृद्ग्रहयोनिदोषान् ।
भग्नास्थिबद्वेषु च खञ्जवाते त्रयोदशाङ्गं प्रवदन्ति सन्तः॥

इस गूगलको छः मासे वा एक तोला परिमाण लेकर मदिरा, यूष, मन्दोष्ण जल वा दूध अथवा मांसरसके साथ सेवन करना चाहिये । इस त्रयोदशाङ्ग गूगलको कमरकी पीडा, गृध्रसी, बाहु और पृष्ठगत वात, हनु ( ठोडी ), जानु ( घुटना ), दोनों चरण, सन्धिस्थान, अस्थि, मज्जा और स्नायुगत वातरोग, कुष्ठ, अस्थिके भग्न, व विद्ध होनेपर और खञ्जवातरोगमें प्रयोग करना चाहिये । यह गूगल वातकफजन्य रोग, वातजनित हृदयकी पीडा, योनिदोष आदि सम्पूर्ण व्याधियोंको नष्ट करता है । इस प्रकार आयुर्वेदाचायोने कहा ह ॥

दशमूलाद्यघृत ।

दशमूलस्य निर्यूहे जीवनीयेः पलोन्मितैः ।
क्षीरेण च घृतं पक्वं तर्पणं वातपित्तजित् ॥
क्वाथोऽत्र द्विगुणः सर्पिःप्रस्थः साध्यः पयःसमम् ॥१६०॥

दशमूलके काढेमें जीवनीयगण ( जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, जीवन्ती, मुलहठी, ऋद्धि और वृद्धि ) की औषधियोंका कल्क चार चार तोले, दूध, एक प्रस्थ और घी एक प्रस्थ डालकर यथाविधि घृतको सिद्ध करे । यह घृत तृप्तिकारक, वात और पित्तको दूर करनेवाला है । इसमें दुगुना क्वाथ, घी और दूध समान भाग लेना चाहिये ॥ १६० ॥

अश्वगन्धाद्यघृत ।

अश्वगन्धाकषाये च कल्के क्षीरं चतुर्गुणम् ।
घृतं पक्वं तु वातघ्नं वृष्यं मांसविवर्द्धनम् ॥ ६१ ॥

असगन्धके क्वाथ और कल्कमें घी और घीसे चौगुना दूध डालकर घृतको पकावे । वातनाशक, वृष्य और मांसवर्द्धक है ॥ ६१ ॥

नकुलाद्यघृत ।

नकुलस्य च मांसस्य पचेत्प्रस्थं जलाढके ।
तत्समं दशमूलं च पक्कं माषबलान्वितम् ॥ ६२ ॥

४१

६४२भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

घृतप्रस्थं पचेत्तत्र चतुर्थांशावशेषितम् ।
शतावरीरसप्रस्थं गव्यदुग्धं च तत्समम् ॥ ६३ ॥
अष्टौ वर्गांश्च काकोल्यौ जीवन्ती मधुयष्टिका ।
एला त्वचं च पत्रं च त्रिकटु त्रिफला तथा ॥
मुस्तकं नागजिह्वा च कर्षं कर्षं प्रदापयेत् ॥ ६४ ॥

नौलेके १ प्रस्थ मांसको १ आढक जलमें पकावे । जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । इसी प्रकार दशमूलकी औषधियाँ, उडद और खिरेंटी इनको एक एक प्रस्थ लेकर पृथक् पृथक् एक एक आढक जलमें पकाकर चौथाई जल शेष रक्खे । फिर उसमें घृत १ प्रस्थ, शतावरका रस १ प्रस्थ, गौका दूध, १ प्रस्थ एवं अष्टवर्गकी औषधियाँ ( जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, ऋद्धि, वृद्धि, काकोली, क्षीरकाकोली ), जीवन्ती, मुलहठी, इलायची, दारचीनी, तेजपात, सोंठ, मिरच, पीपल, हरड, बहेडा, आमला, नागरमोथा और अनन्त-मूल, इन प्रत्येकके कल्कको एक एक कर्ष परिमाण डालकर विधिपूर्वक घृतको पकावे ॥ ६२–६४ ॥

सर्ववातविकारेषु अपस्मारे विशेषतः ॥ ६५ ॥
पक्षाघाते महोन्मादे चाध्माने कोष्ठनिग्रहे ।
हस्तकम्पे शिरःकम्पे बाधिर्य्ये मुकमिन्मिने ॥ ६६ ॥
ऊर्ध्वजत्रुगते वाते जंघापार्श्वादिसंश्रिते ।
नकुलाद्यमिदं नाम्ना ऊर्ध्वजत्रुगदापहम् ॥ ६७ ॥

इस नकुलाद्यनामक घृतको सर्वप्रकारके वातविकार, विशेषकर अपस्मार, पक्षाघात, महोन्माद, आध्मान, कोष्ठबद्धता, हस्तकम्प, शिरःकम्प, बधिरता, मूकता, मिन्मिनापन, ऊर्ध्वजत्रुगतवात, जंघागतवात, और पार्श्वादिगत वातरोगोंमें सेवन कराना चाहिये । यह ऊर्ध्वजत्रुगत सम्पूर्ण रोगोंको दूर करता है ॥ ६५–६७ ॥

छागलाद्यघृत ।

आजं चर्मविनिर्मुक्तं त्यक्तशृङ्गनखादिकम् ।
पञ्चमूलीद्वयं चैव जलद्रोणे विपाचयेत् ॥ ६८ ॥
तेन पादावशेषेण घृतप्रस्थं विपाचयेत् ।
जीवनीयैः सयष्ट्याह्वैः क्षीरं चैव शतावरीम् ॥ ६९ ॥

चर्म, सींग और नखादिसे रहित बकरेका मांस ५० पल और दशमूलके समान भाग मिश्रित समस्त ओषधियाँ ५० पल लेकर दोनोंको अलग अलग

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६४३

एकएक द्रोण (३२ सेर) जलमें पकावे । जब पकते-पकते चौथाई भाग जल शेष रह जाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उसमें घी एक प्रस्थ, दूध १ प्रस्थ, शतावरका रस १ प्रस्थ एवं जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, ऋद्धि, वृद्धि, काकोली, क्षीरकाकोली, मुगवन, माषवन, जीवन्ती और मुलहठी इन सबका कल्क घीसे चौथाई भाग डालकर घृतको पकाना चाहिये ॥ ६८ ॥ ६९ ॥

छागलाद्यमिदं नाम्ना सर्ववातविकारनुत् ।
अद्दिते कर्णशूले च बाधिर्ये मूकमिन्मिने ॥ ७० ॥
जडगद्गदपंगूनां खञ्जे गृध्रसिकुब्जयोः ।
अपतानेऽपतन्त्रे च सर्पिरेतत्प्रशस्यते ॥ ७१ ॥

इस छागलाद्य घृतको सेवन करनेसे सर्व प्रकारके वातरोग नष्ट होते हैं । यह घृत अर्दितवात, कर्णशूल, बधिरता, मूकता, मिन्मिनापन, जडता, गद्गदता, पंगुता, खञ्जवात, गृध्रसी, कुब्डापन, अपतानक और अपतन्त्रक इन समस्त रोगोंमें हितकर है ॥ ७०-७१ ॥

बृहच्छागलाद्यघृत ।

छागमांसतुलां गृह्य दशमुल्याः पलं शतम् ।
अश्वगन्धापलशतं वात्यालकशतं तथा ॥ ७२ ॥
घृताढकं पचेत्तोयैश्चतुर्भागावशेषितैः ।
क्षीरं स्नेहमयं दद्याच्छतावर्या रसं तथा ॥
ताम्रपात्रे दृढे चैव शनैर्मृद्वग्निना पचेत् ॥ ७३ ॥

आरोग्य बकरीका अथवा नपुंसक बकरेका मांस १०० पल, दशमूल १०० पल, असगन्ध १०० पल और खिरेंटी १०० पल लेकर प्रत्येकको एक एक द्रोण परिमाण जलमें पकावे । जब पकते २ चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे और सबको एकत्र मिलालेवे । फिर उस क्वाथमें गौका घी, दूध, और शतावरका रस प्रत्येक एकएक आढक ( १२८ पल) डालकर सुदृढ ताँबेके बर्तन में धीरे धीरे मन्दमन्द अग्निके द्वारा पकावे ॥ ७२ ॥ ७३ ॥

अस्यौषधस्य कल्कस्य प्रत्येकं शुक्तिसम्मितम् ॥ ७४ ॥
जीवन्ती मधुकं द्राक्षा काकोल्यौ नीलमुत्पलम् ।
मुस्तं सचन्दनं रास्ना पर्णिनीद्वयशांरिवे ॥ ७५ ॥

६४४भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

मेदे द्वे च तथा कुष्ठं जीवकर्षभकौ शठी ।
दार्वीप्रियङ्गु त्रिफला नतं तालीशपद्मकौ ॥ ७६ ॥
एला पत्रं वरी नागं जातीकुसुमधान्यकम् ।
मञ्जिष्ठां दाडिमं दारु रेणुकं सैलवालुकम् ॥ ७७ ॥
विडङ्गं जीरकं चैव पेषयित्वा विनिक्षिपेत् ।
वस्त्रपूते च शीते च शर्कराप्रस्थसंयुक्तम् ॥ ७८ ॥
निधापयेत्स्निग्धभाण्डे मृन्मये भाजने शुभे ।
देवदेवं नमस्कृत्य सम्पूज्य गणनायकम् ॥ ७९ ॥
पिबेत्पाणितलं तस्य व्याधिं वीक्ष्यानुपानतः ।
अस्यौषधस्य सिद्धस्य शृणु वीर्यमतः परम् ॥ ८० ॥

कल्कके लिये जीवन्ती, मुलहटी, दाख, काकोली, क्षीरकाकोली, नीलकमल, नागरमोथा, लालचन्दन, गङ्गा, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, शारिवा, अनन्तमूल, मेदा, महामेदा, कूठ, जीवक, ऋषभक, कचूर, दारुहल्दी, फूलप्रियंगु, त्रिफला, तगर, तालीसपत्र, पद्माख, इलायची, तेजपात, शतावर, नागकेशर, चमेलीके फूल, धनियाँ, मंजीठ, अनार, देवदारु, रेणुका, भूरिछरीला, एलुआ, वायविडंग और जीरा इस प्रत्येक औषधिको चार चार तोले पीसकर पकते समय डालदेवे । जब घृत उत्तम प्रकारसे पककर शीतल होजाय तब वस्त्रमें छानकर उसमें एक प्रस्थ शुद्ध खाँड मिलाकर चिकने और स्वच्छ मिट्टीके बर्त्तनमें भरकर रखदेवे । प्रतिदिन प्रातःकाल देवाधिदेव गणेशजीको नमस्कार और पूजन कर एक एक तोला परिमाण घृत पान करे और ऊपरसे यथारोगानुसार अनुपानका सेवन करे । अब इस सिद्ध औषधके वीर्यको कहते हैं, उसको सुनो-॥७४-८०॥

सर्ववातविकारेषु अपस्मारे विशेषतः ।
उन्मादे पक्षघाते च आध्माने कोष्ठनिग्रहे ॥ ८१ ॥
कर्णरोगे शिरोरोगे बाधिर्ये चापतन्त्रके ।
भूतोन्मादे च गृध्रस्यां सोदरे चाक्षिपातजे ॥ ८२ ॥
पार्श्वशूले च हृच्छूले बाह्यायामेऽर्दिते तथा ।
वातकण्टकहृद्रोगमूत्रकृच्छ्रसपङ्कके ॥ ८३ ॥
क्रोष्टुशीर्षे तथा खञ्जे कुब्जे चाध्मानमिन्मिने ।
अपतानेऽन्तरायामे रक्तपित्ते तथोर्ध्वगे । ८४ ॥

चिकित्सा | भाषाटीकासहिता । | ६४६

आनाहेऽर्शोविकारेषु चातुर्थिकज्वरेऽपि च । हनुग्रहे तथा शोषे क्षीणे चैवापबाहुके ॥ ८५ ॥ दण्डापतानके भग्ने दाहे चाक्षेपके तथा । जीर्णज्वरे विषे कुष्ठे शेफःस्तम्भे मदात्यये ॥ ८६ ॥ आढ्यवातेऽग्निमान्द्ये च वातरक्तगदेषु च । एकाङ्गरोगिणे चैव तथा सर्वाङ्गरोगिणे ॥ ८७ ॥ हस्तकम्पे शिरःकम्पे जिह्वास्तम्भे ज्वरे भ्रमे । क्षीणेन्द्रिये नष्टशुके शुक्रनिस्सरणे तथा ॥ ८८ ॥ स्त्रीणां वातास्रपाते च पटले चाक्षिस्पन्दने । एकाङ्गस्पन्दने चैव सर्वाङ्गस्पन्दने तथा ॥ ८९ ॥ नगादिपतिते वाते स्त्रीणामप्राप्तिहेतुके । आभिचारिकदोषे च मनस्सन्तापसम्भवे ॥ १९० ॥

यह घृत सर्व प्रकारके वातरोग, विशेषकर अपस्मार, उन्माद, पक्षाघात, आध्मान, कोष्ठबद्धता, कर्णरोग, शिरोरोग, बधिरताँ, अपतन्त्रक, भूतोन्माद, गृध्रसी, उदररोग, नेत्ररोग, पार्श्वशूल, हृदयशूल, बाह्यायाम, अर्दित, वातकण्टक, हृदयरोग मूत्रकृच्छ्र, पंगुता, क्रोष्टुशीर्ष, खञ्जवात, कुब्जवात, गद्गदवात मिनमिनवात, अपतानक, अन्तरायाम, ऊर्ध्वगत रक्तपित्त, अफारा, बवासीर, चौथिया ज्वर, हनुग्रह, शोष, क्षीणता, अपबाहुक, दण्डापतानक, भग्नरोग, दाह आक्षेप, जीर्णज्वर, विषविकार, कोढ, लिंगस्तम्भ, मदात्यय, आढ्यवात, अग्निकी मन्दता, वातरक्त, एकांगवात, सर्वांगवात, हस्तकम्प, शिरःकम्प, जिह्वाकी जडता, ज्वर, भ्रम, इन्द्रियोंकी क्षीणता, वीर्यकी हीनता शुक्रपात, स्त्रियोंके वातके द्वारा रक्तस्राव होना, पटलगत नेत्ररोग, आँख फडकना, एक अंग व सम्पूर्ण अंगोंका स्पन्दन (फडकना), वृक्ष-पर्वतादिकें ऊपरसे गिरनेसे उत्पन्न हुई वात, स्त्रियोंकी अप्राप्तिके कारण उत्पन्न हुई वात, अभिचारक दोष और मनके सन्तापसे उत्पन्न हुई वातव्याधिमें सेवन करना चाहिये ॥ ८४-१९० ॥

ये वातप्रभवा रोगा ये च पित्तसमुद्भवाः । शिरोमध्यगता ये च जङ्घापार्श्वादिसंस्थिताः ॥ ९१ ॥ मातृग्रहाभिभूतश्च शिशुर्यश्च विशुष्यति । प्रक्षीणबलमांसश्च न वर्त्मगमनक्षमः ॥ ९२ ॥

६४६ | भैषज्यरत्नावली । | [ वातव्याधि-

घृतेनानेन सिध्यन्ति वज्रं मुक्तमिवासुरान् ।
निहन्ति सकलान्रोगान् घृतं परमदुर्लभम् ॥ ९३ ॥

सर्व प्रकारके वातसे उत्पन्न होनेवाले रोग, पित्तसे होनेवाले सर्व प्रकारके रोग, सम्पूर्ण शिरके रोग, जंघा, पसली आदिके रोग, मातृग्रहादिके आक्रमणसे या अन्यान्य दोषोंसे बालकका सूखना, बल और मांसकी क्षीणता और मार्गमें चलनेकी असमर्थता आदि सम्पूर्ण रोग इस घृतके सेवन करनेसे इस प्रकार नष्ट होजाते हैं, जैसे छूटा हुआ वज्र असुरोंको तत्काल नाश करदेता है। यह परमदुर्लभ घृत समस्त रोगोंको हरनेवाला है ॥ ९१–९३ ॥

रसायनं वह्निबलप्रदं च वपुःप्रकर्षं विदधाति रूपम् ।
दन्तावलेन्द्रेण समानतेजा दीर्घायुषं पुत्रशतं करोति ॥ ९४ ॥
स्त्रीणां शतं गच्छति चातिरेकं न याति तृप्तिं सरसः समाङ्गः ।
अपुत्रिणीं पुत्रशतं करोति गतायुषं कामसमं बलिष्ठम् ॥ ९५ ॥
महद् घृतं नाम तु छागलाद्यं विनिर्मितं वातनिषूदनं च ।
शिवं शुभं रोगभयापहं च चकार हारीतमुनिर्विशिष्टः ॥ ९६ ॥

यह घृत रसायन, अग्निप्रदीपक, बलवर्द्धक, शरीरको श्रेष्ठ और सुन्दर करनेवाला, गजेन्द्रकी समान तेजस्वी और चिरायुवाले सौ पुत्रोंको उत्पन्न करनेवाला है। इसको सेवन करनेवाला मनुष्य सौ स्त्रियोंके साथ रमण करे तो भी (सारस पक्षीकी समान) तृप्त नहीं होता तथा समशरीर, अक्षीण वीर्यवाला ही रहता है। वन्ध्यास्त्री भी सैकड़ों पुत्रोंवाली होती है और वृद्ध मनुष्य कामदेवकी समान बलवान् होता है। इस वृद्धच्छागलाद्यनामक घृतको वातके नष्ट करने एवं कल्याण करनेके लिये और रोगोंका भय निवारण करनेके लिये हारीतमुनिने निर्माण किया है ॥ ९४–९६ ॥

हंसाद्यघृत ।

हंसमांसतुलां नीत्वा जलद्रोणे विपाचयेत् ।
पादशेषे रसे तस्मिन्प्रस्थं प्रतनसर्पिषः ॥ ९७ ॥
सैन्धवं कुडवार्द्धं च तैलमेरण्डसम्भवम् ।
कुडवं घृततुल्यं च भूलतासम्भवं रसम् ॥ ९८ ॥
प्रक्षिप्य विपचेत्सर्पिः कुशलो मतिमान् भिषक् ।
पक्षाघातादिवातेषु घृतं स्यादमृतोपमम् ॥ ९९ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६४७

हंसके मांसको १०० पल लेकर ३२ सेर जलमें पकावे। जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे। फिर उस रसमें पुराना घी १ प्रस्थ, सेंधानमक १६ तोले, अण्डीका तेल ३२ तोले और केंचुआका रस ६४ तोले डालकर चतुर वैद्य विधिपूर्वक घृतको पकावे। यह घृत पक्षाघात आदि वातरोगमें अमृतकी समान गुण करता है ॥ ९७-९९ ॥

रसोनाद्य तैल ।

रसोनाकल्कस्वरसेन पक्वं तैलं पिबेद्यस्त्वनिलामयार्तः ।
तस्याशु नश्यन्ति च वातरोगा ग्रन्था विशाला इव दुर्ग्रहीताः ॥ २०० ॥

जो वातरोगी लहसनके कल्क और स्वरसके साथ तिलके तैलको पकाकर पान करे तो उसके सम्पूर्ण वातरोग इस प्रकार नष्ट होते हैं जैसे दुष्टबुद्धिके पास पडे हुए महान् ग्रन्थ ॥ २०० ॥

मूलकाद्य तैल ।

मूलकस्वरसं तैलं क्षीरं दध्यम्लकाञ्जिकम् ।
तुल्यं विपाचयेत्कल्कैर्बलाशिग्रुकसैन्धवैः ॥ १ ॥
पिप्पलयतिविषारास्नाचविकागुरुचित्रकैः ।
भल्लातकवचाकुष्ठश्वदंष्ट्राविश्वभेषजैः ॥ २ ॥
पुष्कराह्वशठीबिल्वशताह्वानतदारुभिः ।
तत्सिद्धं पीतमत्युग्रान् हन्ति वातात्मकान् गदान् ॥ ३ ॥

मूलीका रस, तिलका तैल, गौका दूध, दही और काँजी ये सब समान भाग लेवे । कल्कके लिये खिरेंटी, सहिंजना, सेंधानमक, पीपल, अतीस, रायसन, चव्य, अगर, चीता, भिलावा, वच, कूठ, गोखुरू, सोंठ, पोहकरमूल, कचूर, बेलकी छाल, सौंफ, तगर और देवदारु इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे और सबको यथाविधि मिलाकर तैलको पकावे । इस प्रकार सिद्ध किये हुए तैलको पीनेसे अत्यन्त प्रबल वातजन्य रोग शीघ्र नष्ट होते हैं ॥

वायुच्छायासुरेन्द्रतैल ।

बल्कलकं पलशतं तत्समं दशमूलकम् ।
जलषोडशिके पक्त्वा पादशेषं समुद्धरेत् ॥ ४ ॥
एतत्क्वाथे पचेत्तैलं द्वात्रिंशत्पलमेव च ।
कल्कार्थं दीयते तत्र मञ्जिष्ठा रक्तचन्दनम् ॥ ५ ॥

६४८भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

कुष्ठमेला देवदारु शैलजं सैन्धवं वचा ।
कक्कोलं पद्मकाष्ठं च शृङ्गी तगरपादिका ॥ ६ ॥
गुडूची मुद्रपर्णी च माषपर्णी शतावरी ।
नागजिह्वा श्यामलता शतपुष्पा पुनर्नवा ॥
एषां तोलद्वयं भागं दत्त्वा तैलं तु पाचयेत् ॥ ७ ॥

खिरेंटी १०० पल और दशमूल १०० पल लेकर दोनोंको पृथक् पृथक् सोलह-गुने जलमें पकावे । जब चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर इस क्वाथमें तिलका तेल ३२ पल और कल्कके लिये मंजीठ, लालचन्दन, कूठ, इलायची, देवदारु, भुरिछरीला, सैंधानमक, वच, शीतलचीनी, पद्माख, काकड़ासिंगी, तगर, गिलोय, मुगवन, मषवन, शतावर, अनन्तमूल, सारिवा, सोया और पुनर्नवा इन प्रत्येकक दो दो तोल चूर्णको डालकर विधिपूर्वक तैलको पकावे ॥ ४-७ ॥

एतत्तैलवरं नाम्ना वायुच्छायासुरेन्द्रकम् ।
सर्ववातविकारेषु हितं पुंसां च योषिताम् ॥ ८ ॥
क्षीणशुक्रार्त्तवानां च नारीणां च विशेषतः ।
चेतोविकारं हन्त्याशु वातमाक्षेपसम्भवम् ॥ ९ ॥
मर्म्मवातं श्रमकृतं गात्रकम्पादिकं तथा ।
हिक्कां श्वासं च कासं च वातपित्तसमुद्भवम् ॥२१०॥
अपस्मारे महोन्मादे हितं लेपे च भक्षणे
श्रीमद्गहननाथेन रचितं विश्वसम्पदे ॥२११॥

यह वायुच्छायासुरेन्द्रनामक श्रेष्ठ तैल सर्व प्रकारक वातरोगोंमें हितकारी है । विशेषकर क्षीणवीर्यवाले पुरुषों और क्षीणरजवाली स्त्रियोंके लिये अत्यन्त उपकारी है । एवं मानसिकविकार, वातजन्य आक्षेपरोग, मर्मगत वात, श्रमजनित वात, शरीरमें कम्प होना, हिक्कारोग और वातपित्तजन्य श्वास, कासरोगको शीघ्र नष्ट करताहै । अपस्मार और प्रबल उन्माद रोगमें इस तेलको मर्दन और भक्षण करनेसे विशेष उपकार होताहै । इसको संसारके कल्याणके लिये श्रीगहननाथजीने रचा है ॥ ८-२११ ॥

[चिकित्सा] भाषाटीकासहिता । ६४९ <br/>

महाबलातैल ।

बलामूलकषायस्य दशमूलीकृतस्य च । यवकोलकुलत्थानां क्वाथस्य पयसस्तथा ॥ १२ ॥ अष्टावष्टौ शुभा भागास्तैलादेकस्तदेकतः । पचेदावाप्य मधुरं गणं सैन्धवसंयुतम् ॥ १३ ॥ तथाऽगुरुं सर्जरसं सरलं देवदारु च । मञ्जिष्ठा चन्दनं कुष्ठमेलां कालानुसारिवाम् ॥ १४ ॥ मांसी शैलेयकं पत्रं तगरं शारिवां वचाम् । शतावरीमश्वगन्धां शतपुष्पां पुनर्नवाम् ॥ १५ ॥ तत्साधु सिद्धं सौवर्णे राजते मृन्मयेऽपि वा । प्रक्षिप्य कलशे सम्यक् सुनिगुप्ते निधापयेत् ॥ १६ ॥

खिरेंटीकी जडका क्वाथ, दशमूलका क्वाथ, जा, बर और कुलथी इन प्रत्येक का क्वाथ आठ आठ सेर, दूध ९ सेर और तिलका तैल एक सेर लेवे । फिर सबको एकत्र मिलाकर उसमें काकोल्यादि गणकी ओषधियाँ ( जीवक, ऋषमक, ऋद्धि, वृद्धि, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, गिलोय, मुगवन, मषवन, पद्माख, वंशलोचन, काकडासिंगी, जीवन्ती, मुलहठी, दाख, पुण्डारिया) सेंधानमक, अगर, सफेदराल, धूपसरल, देवदारु, मंजीठ, लालचन्दन, कूठ, इलायची, तगर, बालछड, भूरिछरीला, तेजपात, तगर, सारिवा, वच, श्तावर, असगन्ध, सोया और पुनर्नवा इन सब ओषधियोंके समान भाग मिश्रित एक सेर कल्कको डालकर मन्दमन्द अग्नि के द्वारा उत्तम प्रकारसे तैलको सिद्ध करे । फिर उसको सुवर्ण या चाँदी अथवा मिट्टीके शुद्ध बर्त्तनमें भरकर और अच्छे प्रकारसे ढककर रखेदेवे ॥ १२–१६ ॥

बलातैलमिदं नाम्ना सर्ववातविकारनुत् । यथाबलं भिषङ् मात्रां सूतिकायै प्रदापयेत् ॥ १७ ॥ या च गर्भार्थिनी नारी क्षीणशुक्रश्च यः पुमान् । क्षीणवाते मर्महतेऽभिहते मथितेऽथवा ॥ १८ ॥ भग्न श्रमाभिपन्ने च सर्वथैवोपयोजयेत् । सर्वमाक्षेपकादींश्च वातव्याधीन् व्यपोहति ॥ १९ ॥

६५० भैषज्यरत्नावली । [वातव्याधि-


हिक्कां कासमधीमन्थं गुल्मं श्वासं सुदुस्तरम् ।
षण्मासानुपयुञ्जीतदन्त्रवृद्धिमपोहति ॥ २२० ॥
अत्युग्रधातुः पुरुषो भवेच्च नवयौवनः ।
एतद्धि राज्ञा कर्तव्यं राजमात्राश्च ये नराः ॥
सुखिनः सुकुमाराश्च बलिनश्चैव ये नराः ॥ २२१ ॥

यह महाबलानामक तैल सर्वप्रकारके वातरोग और अन्य अनेक रोगोंको नष्ट करता है । वैद्य, यह तेल प्रसूता स्त्रीको उसके बलके अनुसार एवं गर्भकी इच्छा करनेवाली स्त्री और क्षीणवीर्य मनुष्यको यथोचित मात्रासे सेवन करावे । इस तेलको वातके द्वारा शरीर क्षीण होनेपर, मर्महत, अभिहत अथवा मथितवात, अस्थि आदि के टूटजानेपर और श्रमजन्य वातरोगमें सर्वथा प्रयोग करना चाहिये । यह सर्वप्रकारकी आक्षेपादि वातव्याधि, हुचकी, खाँसी, नेत्ररोग, गुल्म, श्वास और अंत्रवृद्धिरोग इन सबको छः मासपर्यन्त सेवन करनेसे नष्ट कर देता है। इसको सेवन करनेसे मनुष्य अत्यन्त प्रबल धातुवाला और नवयौवनयुक्त होता है। राजकर्मचारी मनुष्य, सुख चाहनेवाले और बलकी इच्छा करनेवाले सुकुमार मनुष्योंको राजाकी आज्ञासे यह तेल निर्माणकर सेवन करना चाहिये ॥ १७–२२१ ॥

अश्वगन्धातैल ।

शतं पत्क्त्वाऽश्वगन्धाया जलद्रोणेऽवशेषितम् ।
विस्राव्य विपचेत्तैलं क्षीरं दत्त्वा चतुर्गुणम् ॥ २२ ॥
कल्कैर्मृणालशालूककबिसकिञ्जल्कमालती ।
पुष्पैर्ह्रीबेरमधुकशारिवापद्मकेशरैः ॥ २३ ॥
मेदापुनर्नवाद्राक्षामञ्जिष्ठाबृहतीद्वयैः ।
एलैवालुत्रिफलामुस्तचन्दनपद्मकैः ॥ २४ ॥
पक्वं रक्ताश्रयं वातं रक्तपित्तमसृग्दरम् ।
हन्यात्पुष्टिं बलं कुर्यात्कृशानां मांसवर्द्धनम् ॥ २५ ॥
रेतोयोनिविकारघ्नं व्रणदोषापकर्षणम् ।
षण्ढानपि वृषान्कुर्यात्पानाभ्यङ्गानुवासनैः ॥ २६ ॥

असगन्धको १०० पल लेकर एक द्रोण जलमें पकावे । जब पककर चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे । फिर उसमें तिलका तैल

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६५१

और तेलसे चौगुना दूध डालकर एवं कमलकी नाल, भसींडा, कमलके सूक्ष्म तन्तु, नागकेशर, मालतीके फूल, सुगन्धवाला, मुलहठी, सारिवा, कमलकेशर, मेदा, पुनर्नवा, दाख, मँजीठ, कटेरी, बडी कटेरी, इलायची, एलुआ, त्रिफला, नागरमोथा, चन्दन और पद्माख इन ओषधियोंके समान भाग मिश्रित कल्कके साथ विधिपूर्वक तैलको सिद्ध करे । यह तैल वातरक्त, रक्तपित्त और रक्तप्रदरको नष्ट करता है । एवं शारीरिक पुष्टि, बल और कृश मनुष्योंके मांसकी वृद्धि करता है । वीर्य और योनिके विकारोंको दूर करता और व्रणके सम्पूर्ण दोषोंको हरता है । पान, मर्दन और अनुवासनवस्तिके द्वारा सेवन करनेसे यह तैल षण्ढ ( नपुंसक ) मनुष्योंकोभी अत्यन्त वीर्यवान् करता है ॥२२–२६॥

श्रीगोपालतैल ।

रसाढकं शतावर्याः कूष्माण्डामलयोस्तथा ।
वाजिगन्धासहचरबलानां च शतं पृथक् ॥ २७ ॥
परिपच्याम्भसां द्रोणे पादशेषेऽवतारयेत् ।
पञ्चमूलं महत् व्याघ्री मूर्वा केतकपूतिका ॥ २८ ॥
पारिभद्रस्य सर्वेषां ग्राह्यं दशपलं शुभम् ।
क्वाथयित्वा जलद्रोणे तत्पादमवशेषयेत् ॥ २९ ॥
आढकं तिलतैलस्य कल्कैरेतैश्च संपचेत् ।
अश्वगन्धा चोरपुष्पी पद्मकं कण्टकारिका ॥ ३० ॥
बलाऽगुरु घनं पूति शिह्लकागुरुचन्दनम् ।
चन्दनं त्रिफला मूर्वा जीवनीयकटुत्रयम् ॥ ३१ ॥
पूतिकुंकुमकस्तूर्यश्चातुर्जातं च शैलजम् ।
नखमुस्तमृणालानि नीलोत्पलमुशीर कम् ॥ ३२ ॥
मांसी मुरा सुरतरुर्वचा दाडिमतुम्बुरू ।
ऋद्धिवृद्धी दमनकं क्षुद्रैलाऽर्द्धपलं पृथक् ॥ ३३ ॥

शतावरका रस १ आढक ( २५६ तोले ), पेठेका रस १ आढक, आमलोंका रस १ आढक, असगन्ध, पीली कटसरैया और खिरैंटी इन तीनोंको सौ सौ पल लेकर पृथक् पृथक् एकएक द्रोण जलमें पकावे । जब पककर चौथाई भाग जल शेष रहे तब उतारकर छानलेवे । इसी प्रकार बेलकी छाल, शोनापाठेकी.छाल, खम्भारीकी छाल, पाढरकी छाल, अरणीकी छाल, बडी कटेरी, मूर्वाकी जड, केतकीकी

६५२भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

जड, पोईका शाक और फरहदकी छाल इन सबको दसदस पल लेकर एकएक द्रोणपरिमाण जलमें पकाकर चतुर्थांश जल शेष रहनेपर उतारकर छानलेवे । फिर सबको एकत्र मिलाकर उसमें तिलका तैल १ आढक एवं असगन्ध, चोरपुष्पी, पद्माख, कटेरी, खिरेंटी, अगर, नागरमोथा, रोहिषतृण, शिलारस, अगर, लालचन्दन, सफेदचन्दन, त्रिफला, मूर्वा, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, मुगवन, मषवन, जीवन्ती, मुलहठी, त्रिकुटा, रोहिषतृण, केशर, कस्तूरी, दारचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर, भूरिछरीला, नख, मोथा, कमलनाल, नीलकमल, खसकी जड, जटामांसी, मुरामांसी, देवदारु, वच, अनार, तुम्बुरु, ऋद्धि, वृद्धि, दौना और छोटी इलायची इन प्रत्येक ओषधिके दो दो तोले कल्कको डालकर मन्दमन्द अग्निके द्वारा उत्तम प्रकारसे तैलको पकावे ॥ २७-३३ ॥

एतत्तैलवरं हन्ति वातपित्तकफोद्भवान् ।
व्याधीनशेषाञ्जनयेत्स्मृतिं मेधां धृतिं धियम् ॥ ३४ ॥
वातरोगान्विशेषेण प्रमेहान् हन्ति विंशतिम् ।
गर्भं संस्थापयेत्स्त्रीणां सर्वं शूलं व्यपोहति ॥
मूत्रकृच्छ्रमपस्मारमुन्मादान्निखिलानपि ॥ ३५ ॥
स्थविरोऽपि जराजीर्णस्तैलस्यास्य निषेवणात् ।
लीलया प्रमदानां च उन्मदानां शतं जयेत् ॥ ३६ ॥
तिष्ठेद्यस्य गृहे तैलं श्रीगोपालाभिधंशुभम् ।
न तत्र भूताः सर्पन्ति न पिशाचा न राक्षसाः ॥ ३७ ॥
न दारिद्र्यं भवेत्तस्य विघ्नः कश्चिन्न जायते ।
अश्विभ्यां निर्मितं ह्येतद्विश्वकल्याणहेतवे ॥ ३८ ॥

यह उत्तम तैल मर्दन करनेसे वात, पित्त और कफसे उत्पन्न हुई सम्पूर्ण व्याधियोंको शीघ्र नष्ट करता है । एवं स्मरणशक्ति, मेधा, धैर्य और बुद्धिको उत्पन्न करता है । विशेषकर वातरोग और बीसों प्रकारके प्रमेहोंको दूर करता है और स्त्रियोंके गर्भको स्थापन करता है । सर्व प्रकारके शूलरोग, मूत्रकृच्छ्र, अपस्मार और सर्वप्रकारके उन्मादरोगोंको नाश करता है । जिसका देह वृद्धावस्थाके द्वारा जीर्ण होगया हो ऐसा वृद्ध मनुष्यभी इस तैलको सेवन करनेसे सैकड़ों उन्मत्त स्त्रियोंको सहजही जीत सकता है । जिसके घरमें यह श्रीगोपालनामक तैल रहता है वहाँ भूत, पिशाच और राक्षस कभी नहीं प्रवेश करते ।

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६५३

उसको न दरिद्रता प्राप्त होती है और न कोई विघ्न उपस्थित होता है । इस तैलको संसारके कल्याणके लिये अश्विनीकुमारोंने निर्माण्ण किया है ॥ ३४-२३८ ॥

विष्णुतैल ।

शालपर्णी पृश्निपर्णी बला च बहुपुत्रिका ।
एरण्डस्य च मूलानि बृहत्योः पूतिकस्य च ॥ ३९ ॥
गवेधुकस्य मूलानि तथा सहचरस्य च ।
एतेषां पलिकैर्भागैस्तैलप्रस्थं विपाचयेत् ॥ २४० ॥
आजं वा यदि वा गव्यं क्षीरं दद्याच्चतुर्गुणम् ।
अस्य तैलस्य पक्वस्य शृणु वीर्यमतः परम् ॥ ४१ ॥
अश्वानां वातभग्नानां कुञ्जराणां तथैव च ।
अपुमांश्च नरः पीत्वा निश्चयेन पुमान् भवेत् ॥ ४२ ॥

शालपर्णी, पृश्निपर्णी, खिरेंटी, शतावर, अण्डकी जड, कटेरी, बडी कटेरीकी जड, दुर्गन्धकरञ्जकी जड, गरहेडुकी जड और पियावाँसेकी जड इन प्रत्येकके चार चार तोले कल्क और गौके अथवा बकरीके चार प्रस्थ दूधके साथ एक प्रस्थ ( ६४ तोले ) तिलका तेल मिलाकर यथाविधि पकाना चाहिये । अब इस प्रकार सिद्ध किये हुए तेलके वीर्यको कहता हू, उसको सुनो-यह तेल वातकी प्रबलतासे नष्ट अङ्गवाले हाथी और घोडोंके लिये अत्यन्त हितकर है । पुरुषत्वहीन मनुष्य इस तेलको पान करनेसे अवश्य पुरुषत्वको प्राप्त होता है ॥ ३९-४२ ॥

हृच्छूले पार्श्वशूले च तथैवार्द्धावभेदके ।
कामलापाण्डुरोगेषु शर्करास्वश्मरीषु च ॥ ४३ ॥
क्षीणेन्द्रिया नरा ये च जरसा जजरीकृताः ।
येषां चैव क्षयो व्याधिरन्त्रवृद्धिश्च दारुणा ॥ ४४ ॥
अर्दितं गलगण्डं च वातशोणितमेव च ।
स्त्रियो या न प्रसूयन्ते तासां चैव प्रदापयेत् ॥ ४५ ॥
गर्भमश्वतरी विन्द्यान्न च मृत्युवशं व्रजेत् ।
एतत्तैलवरं चैव विष्णुना परिकीर्त्तितम् ॥ ४६ ॥

हृदयशूल, पार्श्वशूल, अर्द्धावभेदक रोग, कामला, पाण्डुरोग, शर्कराका जाना, पथरीरोगमें एवं वृद्धताके कारण क्षीण होगई हैं इन्द्रिय जिनकी ऐसे और जीर्ण देह-

६५४ भैषज्यरत्नावली । [ वातव्याधि-

वाले वृद्ध मनुष्योंको तथा क्षयरोग, दारुण अन्त्रवृद्धि, अर्दितवात, गलगण्डरोग और वातरक्तसे युक्तको तथा वन्ध्यास्त्रियोंको यह तेल सेवन करना चाहिये। इसके प्रभावसे खच्चरी भी गर्भको धारण करती है और इसको सेवन करनेवाला मनुष्य मृत्युको प्राप्त नहीं होता, इस अत्युत्तम तेलको विष्णु भगवान्ने वर्णन किया है ॥ २४३-२४६ ॥

बृहद्विष्णुतैल ।

पयोधरं चाश्वगन्धा जीवकर्षभकौ शठी ।
काकोली क्षीरकाकोली जीवन्ती मधुयष्टिका ॥ ४७ ॥
मधूरिका देवदारु पद्मकाष्ठं च शैलजम् ।
मांसी चैला त्वचं कुष्ठं वचा चन्दनकुङ्कुमम् ॥ ४८ ॥
मञ्जिष्ठा मृगनाभिश्च श्वेतचन्दनरेणुकम् ।
पर्णिन्यः कुन्दुरुखोटी च ग्रन्थिकं च नखी तथा ॥ ४९ ॥
एतेषां पलिकैर्भागैस्तैलस्यापि तथाऽऽढकम् ।
शतावरीरसं तुल्यं दुग्धं चापि समं पचेत् ॥ २५० ॥

नागरमोथा, असगन्ध, जिविक, ऋषभक, कचूर, काकोली, क्षीरकाकोली, जीवन्ती, मुलहठी, सौंफ, देवदारु, पद्माख, भूरिछरीला, बालछड, इलायची, दारचीनी, कूट, वच, लालचन्दन, केशर, मंजीठ, कस्तूरी, श्वेतचन्दन, रेणुका, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, मुगवन, मषवन, कुन्दुरु, गठिवन और नख इन प्रत्येक औषधिका कल्क चार चार तोले एवं तिलका तैल १ आढक, शतावरका रस १ आढक और गोदुग्ध १ आढक लेवे । इन सबको एकत्र मिलाकर विधिपूर्वक तैलको पकावे ॥ ४७-२५० ॥

विष्णुतैलमिदं श्रेष्ठं सर्ववातविकारनुत् ।
ऊर्ध्ववातं तथा वातमङ्गनिग्रहमेव च ॥ ५१ ॥
शिरोमध्यगतं वातं मन्थास्तम्भं गलग्रहम् ।
हन्ति नानाविधं वातं सन्धिमज्जागतं तथा ॥
यस्य शुष्यति चैकाङ्गं गतिर्यस्य च विह्वला ॥ ५२ ॥
ये वातप्रभावा रोगा ये च पित्तसमुद्भवाः ।
सर्वांस्तान्नाशयत्याशु सूर्यस्तम इवोदितः ॥ ५३ ॥

[ चिकित्सा भाषाटीकासहिता । ६५५

यह श्रेष्ठ विष्णुत्तैल सर्व प्रकारके वातविकारोंको दूर करता है। ऊर्ध्वगत वात' सर्वांगवातकी पीडा, शिरके वातरोग, मन्यास्तम्भ, गलेके रोग, सन्धि व मज्जागत वात और अन्य नानाप्रकारके वातरोगोंको नष्ट करता है। एक अंगका सूख जाना, गतिशक्तिकी शिथिलता एवं वातसे और पित्तसे उत्पन्न हुए सर्व प्रकारके रोगोंको यह तेल इस प्रकार नाश करदेता है जैसे सूर्यका प्रकाश अन्धकारको तत्काल नष्ट करदेता है ॥ ५१–५३ ॥ नारायणतैल ।

शतावरी चांशुमती पृश्निपर्णी शठी बला ।
एरण्डस्य च मूलानि बृहत्योः पूतिकस्य च ॥ ५४ ॥
गवेधुकस्य मूलानि तथा सहचरस्य च ।
एषां दशपलान्भागान्जलद्रोणे विपाचयेत् ॥ ५५ ॥
पादशेषे च पूते च गर्भं चैनं समावपेत् ।
पुनर्नवा वचा दारु शताह्वा चन्दनागुरु ॥ ५६ ॥
शैलेयं तगरं कुष्ठमेला मांसी स्थिरा बला ।
अश्वाह्वा सैन्धवं रास्ना पलार्द्धानि च योजयेत् ॥ ५७ ॥
गव्याजपयसोः प्रस्थौ द्वौ द्वावत्र प्रदापयेत् ।
शतावरीरसप्रस्थं तैलप्रस्थं विपाचयेत् ॥
अस्य तैलस्य सिद्धस्य शृणु वीर्यमतः परम् ॥ ५८ ॥

शतावर, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, कचूर, खिरेंटी, अण्डकी जड, कटेरी और बडी कटेरीकी जड, दुर्गन्धकरञ्जकी जड, गरहेडुयेकी जड, और पियाबाँसेकी जड इन सबको दस दस पल लेकर १ द्रोण जलमें पकावे । जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर वस्त्रमें छान लेवे । फिर इस क्वाथमें पुनर्नवा, वच, देवदारू, सौंफ, रक्तचन्दन, अगर, भूरिछरीला, तगर, कूठ, इलायची, बालछड, शालपर्णी, खिरेंटी, असगन्ध, सैंधानमक और रास्ना इन प्रत्येकका कल्क दो दो तोले, एवं गौका दूध २ प्रस्थ, बकरीका दूध दो प्रस्थ, शतावरका रस १ प्रस्थ और तिलका तैल एक प्रस्थ डालकर उत्तम प्रकारसे तैलको पकावे । अब इस प्रकार सिद्ध कियेहुए तेलके वीर्यको सुनो—५४–५८ ॥

अश्वानां वातभग्नानां कुञ्जराणां तथा नृणाम् ॥ ५९ ॥
तैलमेतत्प्रयोक्तव्यं सर्ववातविकारनुत् ।
आयुष्मांश्च नरः पीत्वा निश्चयेन दृढो भवेत् ॥ ६० ॥

६५६ भैषज्यरत्नावली । [ वातव्याधि-

गर्भमश्वतरीविन्द्यात्किंपुनर्मानुषी तथा । हृच्छूलं पार्श्वशूलं च वातरक्तं गलग्रहम् ॥ ६१ ॥ अपचीं गण्डमालां च तथैवार्द्धावभेदकम् । कामलां पाण्डुरोगं च अश्मरीं चैव नाशयेत् ॥ ६२ ॥ तैलमेतद्भगवता विष्णुना परिकीर्तितम् । नारायणमिदं ख्यातं वातान्तकरणं परम् ॥ ६३ ॥

यह तेल वातरोगसे टूटगये अंग जिनके ऐसे घोडे, हाथी और मनुष्योंको सेवन कराना चाहिये । इससे सर्वप्रकारके वातरोग नष्ट होते हैं । इसको पान करनेसे मनुष्य दीर्घायु और सुदृढ अंगवाला होता है । इसके सेवन करनेसे खच्चरीभी गर्भको धारण कर लेतीहै फिर स्त्रीका तो कहनाही क्या ? यह तैल हृदयशूल, पसलीकी पीडा, वातरक्त, गलेके रोग, अपची, गण्डमाला, अर्द्धावभेदक, कामला, पाण्डुरोग और पथरी इन सब रोगोंको नष्ट करताहै । इस तैलको विष्णुभगवान्‌ने निर्माण कियाहै, इसलिये इसको नारायणतैल कहते हैं । यह सर्वप्रकारके वातरोगोंको समूल नाश करताहै ॥ २५९-२६३ ॥

मध्यमनारायणतैल ।

बिल्वोऽग्निमन्थः श्योनाकः पाटलः पारिभद्रकः । प्रसारण्यश्वगन्धा च बृहती कण्टकारिका । बला चातिबला चैव श्वदंष्ट्रा सपुनर्नवा ॥ ६४ ॥ एषां दशपलान्भागांश्चतुर्द्रोणेऽम्भसः पचेत् । पादशेषं परिस्राव्य तैलपात्रं प्रदापयेत् । शतपुष्पा देवदारु मांसी शैलेयकं वचा ॥ ६५ ॥ चन्दनं तगरं कुष्ठमेला पर्णीचतुष्टयम् । रास्ना तुरगगन्धा च सैन्धवं सपुनर्नवम् ॥ ६६ ॥ एषां द्विपलीकान्भागान्पेषयित्वा विनिक्षिपेत् । शतावरीरसं चैव तैलतुल्यं प्रदापयेत् ॥ ६७ ॥ आजं वा यदि वा गव्यं क्षीरं दद्याच्चतुर्गुणम् । पाने वस्तौ तथाऽभ्यङ्गे भोज्ये चैव प्रशस्यते ॥ ६८ ॥

बेलकी छाल, अरणीकी छाल, सोनापाठेकी छाल, पाढरकी छाल, फरहदकी छाल, प्रसारणी, असगन्ध, बडी कटेरी, कटेरी, खिरैंटी, कंघी, गोखुरू और