भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६५० भैषज्यरत्नावली । [वातव्याधि-
हिक्कां कासमधीमन्थं गुल्मं श्वासं सुदुस्तरम् ।
षण्मासानुपयुञ्जीतदन्त्रवृद्धिमपोहति ॥ २२० ॥
अत्युग्रधातुः पुरुषो भवेच्च नवयौवनः ।
एतद्धि राज्ञा कर्तव्यं राजमात्राश्च ये नराः ॥
सुखिनः सुकुमाराश्च बलिनश्चैव ये नराः ॥ २२१ ॥
यह महाबलानामक तैल सर्वप्रकारके वातरोग और अन्य अनेक रोगोंको नष्ट करता है । वैद्य, यह तेल प्रसूता स्त्रीको उसके बलके अनुसार एवं गर्भकी इच्छा करनेवाली स्त्री और क्षीणवीर्य मनुष्यको यथोचित मात्रासे सेवन करावे । इस तेलको वातके द्वारा शरीर क्षीण होनेपर, मर्महत, अभिहत अथवा मथितवात, अस्थि आदि के टूटजानेपर और श्रमजन्य वातरोगमें सर्वथा प्रयोग करना चाहिये । यह सर्वप्रकारकी आक्षेपादि वातव्याधि, हुचकी, खाँसी, नेत्ररोग, गुल्म, श्वास और अंत्रवृद्धिरोग इन सबको छः मासपर्यन्त सेवन करनेसे नष्ट कर देता है। इसको सेवन करनेसे मनुष्य अत्यन्त प्रबल धातुवाला और नवयौवनयुक्त होता है। राजकर्मचारी मनुष्य, सुख चाहनेवाले और बलकी इच्छा करनेवाले सुकुमार मनुष्योंको राजाकी आज्ञासे यह तेल निर्माणकर सेवन करना चाहिये ॥ १७–२२१ ॥
अश्वगन्धातैल ।
शतं पत्क्त्वाऽश्वगन्धाया जलद्रोणेऽवशेषितम् ।
विस्राव्य विपचेत्तैलं क्षीरं दत्त्वा चतुर्गुणम् ॥ २२ ॥
कल्कैर्मृणालशालूककबिसकिञ्जल्कमालती ।
पुष्पैर्ह्रीबेरमधुकशारिवापद्मकेशरैः ॥ २३ ॥
मेदापुनर्नवाद्राक्षामञ्जिष्ठाबृहतीद्वयैः ।
एलैवालुत्रिफलामुस्तचन्दनपद्मकैः ॥ २४ ॥
पक्वं रक्ताश्रयं वातं रक्तपित्तमसृग्दरम् ।
हन्यात्पुष्टिं बलं कुर्यात्कृशानां मांसवर्द्धनम् ॥ २५ ॥
रेतोयोनिविकारघ्नं व्रणदोषापकर्षणम् ।
षण्ढानपि वृषान्कुर्यात्पानाभ्यङ्गानुवासनैः ॥ २६ ॥
असगन्धको १०० पल लेकर एक द्रोण जलमें पकावे । जब पककर चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे । फिर उसमें तिलका तैल