भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६५१
और तेलसे चौगुना दूध डालकर एवं कमलकी नाल, भसींडा, कमलके सूक्ष्म तन्तु, नागकेशर, मालतीके फूल, सुगन्धवाला, मुलहठी, सारिवा, कमलकेशर, मेदा, पुनर्नवा, दाख, मँजीठ, कटेरी, बडी कटेरी, इलायची, एलुआ, त्रिफला, नागरमोथा, चन्दन और पद्माख इन ओषधियोंके समान भाग मिश्रित कल्कके साथ विधिपूर्वक तैलको सिद्ध करे । यह तैल वातरक्त, रक्तपित्त और रक्तप्रदरको नष्ट करता है । एवं शारीरिक पुष्टि, बल और कृश मनुष्योंके मांसकी वृद्धि करता है । वीर्य और योनिके विकारोंको दूर करता और व्रणके सम्पूर्ण दोषोंको हरता है । पान, मर्दन और अनुवासनवस्तिके द्वारा सेवन करनेसे यह तैल षण्ढ ( नपुंसक ) मनुष्योंकोभी अत्यन्त वीर्यवान् करता है ॥२२–२६॥
श्रीगोपालतैल ।
रसाढकं शतावर्याः कूष्माण्डामलयोस्तथा ।
वाजिगन्धासहचरबलानां च शतं पृथक् ॥ २७ ॥
परिपच्याम्भसां द्रोणे पादशेषेऽवतारयेत् ।
पञ्चमूलं महत् व्याघ्री मूर्वा केतकपूतिका ॥ २८ ॥
पारिभद्रस्य सर्वेषां ग्राह्यं दशपलं शुभम् ।
क्वाथयित्वा जलद्रोणे तत्पादमवशेषयेत् ॥ २९ ॥
आढकं तिलतैलस्य कल्कैरेतैश्च संपचेत् ।
अश्वगन्धा चोरपुष्पी पद्मकं कण्टकारिका ॥ ३० ॥
बलाऽगुरु घनं पूति शिह्लकागुरुचन्दनम् ।
चन्दनं त्रिफला मूर्वा जीवनीयकटुत्रयम् ॥ ३१ ॥
पूतिकुंकुमकस्तूर्यश्चातुर्जातं च शैलजम् ।
नखमुस्तमृणालानि नीलोत्पलमुशीर कम् ॥ ३२ ॥
मांसी मुरा सुरतरुर्वचा दाडिमतुम्बुरू ।
ऋद्धिवृद्धी दमनकं क्षुद्रैलाऽर्द्धपलं पृथक् ॥ ३३ ॥
शतावरका रस १ आढक ( २५६ तोले ), पेठेका रस १ आढक, आमलोंका रस १ आढक, असगन्ध, पीली कटसरैया और खिरैंटी इन तीनोंको सौ सौ पल लेकर पृथक् पृथक् एकएक द्रोण जलमें पकावे । जब पककर चौथाई भाग जल शेष रहे तब उतारकर छानलेवे । इसी प्रकार बेलकी छाल, शोनापाठेकी.छाल, खम्भारीकी छाल, पाढरकी छाल, अरणीकी छाल, बडी कटेरी, मूर्वाकी जड, केतकीकी