भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६४१
कटीग्रहे गृध्रसि बाहुपृष्ठे हनुग्रहे जानुनि पादयुग्मे ।
सन्धिस्यिते चास्थिगते च वाते मज्जाश्रिते स्नायुगते च कुष्ठे ॥
रोगाञ्जयेद्वातकफानुविद्धान् वातेरितान्हृद्ग्रहयोनिदोषान् ।
भग्नास्थिबद्वेषु च खञ्जवाते त्रयोदशाङ्गं प्रवदन्ति सन्तः॥
इस गूगलको छः मासे वा एक तोला परिमाण लेकर मदिरा, यूष, मन्दोष्ण जल वा दूध अथवा मांसरसके साथ सेवन करना चाहिये । इस त्रयोदशाङ्ग गूगलको कमरकी पीडा, गृध्रसी, बाहु और पृष्ठगत वात, हनु ( ठोडी ), जानु ( घुटना ), दोनों चरण, सन्धिस्थान, अस्थि, मज्जा और स्नायुगत वातरोग, कुष्ठ, अस्थिके भग्न, व विद्ध होनेपर और खञ्जवातरोगमें प्रयोग करना चाहिये । यह गूगल वातकफजन्य रोग, वातजनित हृदयकी पीडा, योनिदोष आदि सम्पूर्ण व्याधियोंको नष्ट करता है । इस प्रकार आयुर्वेदाचायोने कहा ह ॥
दशमूलाद्यघृत ।
दशमूलस्य निर्यूहे जीवनीयेः पलोन्मितैः ।
क्षीरेण च घृतं पक्वं तर्पणं वातपित्तजित् ॥
क्वाथोऽत्र द्विगुणः सर्पिःप्रस्थः साध्यः पयःसमम् ॥१६०॥
दशमूलके काढेमें जीवनीयगण ( जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, जीवन्ती, मुलहठी, ऋद्धि और वृद्धि ) की औषधियोंका कल्क चार चार तोले, दूध, एक प्रस्थ और घी एक प्रस्थ डालकर यथाविधि घृतको सिद्ध करे । यह घृत तृप्तिकारक, वात और पित्तको दूर करनेवाला है । इसमें दुगुना क्वाथ, घी और दूध समान भाग लेना चाहिये ॥ १६० ॥
अश्वगन्धाद्यघृत ।
अश्वगन्धाकषाये च कल्के क्षीरं चतुर्गुणम् ।
घृतं पक्वं तु वातघ्नं वृष्यं मांसविवर्द्धनम् ॥ ६१ ॥
असगन्धके क्वाथ और कल्कमें घी और घीसे चौगुना दूध डालकर घृतको पकावे । वातनाशक, वृष्य और मांसवर्द्धक है ॥ ६१ ॥
नकुलाद्यघृत ।
नकुलस्य च मांसस्य पचेत्प्रस्थं जलाढके ।
तत्समं दशमूलं च पक्कं माषबलान्वितम् ॥ ६२ ॥
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