भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६४० भैषज्यरत्नावली । [ वातव्याधि-
रससिन्दूरकी जगह स्वर्णसिन्दूर डालना चाहिये । हीरेके अभावमें वैक्रान्तमणि अथवा पीली कौडीकी भस्म लेनी चाहिये । ]
स्वल्परसोनपिण्ड ।
पलमर्द्धपलं चैव रसोनस्य सुकुट्टितम् ।
हिङ्गुजीरकसिन्धूत्थैः सौवर्चलकटुत्रिकैः ॥ ५२ ॥
चूर्णितैर्माषकोन्मानैरवचूर्ण्य विलोडितम् ।
यथाग्नि भक्षितं प्रातारुबुक्वाथानुपानतः ॥ ५३ ॥
दिनेदिने प्रयोक्तव्यं मासमेकं निरन्तरम् ।
वातरोगं निहन्त्याशु अर्दितं सापतन्त्रकम् ॥ ५४ ॥
एकाङ्गरोगिणे चैव तथा सर्वाङ्गरोगिणे ।
ऊरुस्तम्भे च गृध्रस्यां कृमिदोषे विशेषतः ।
कटीपृष्ठामयं हन्यादुदरं च विनाशयेत् ॥ ५५ ॥
छिल्के आदिसे रहित और शुद्ध लहसनको ६ तोले लेकर कूटलेवे । फिर उसमें हींग, जीरा, सेंधानमक, कालानमक और त्रिकुटा ये प्रत्येक एक-एक माशे परिमाण बारीक चूर्णकर मिलादेवे । इसको प्रतिदिन प्रातःकाल अग्निके बलानुसार उपयुक्त मात्रासे अण्डके क्वाथके साथ एक महीनेतक सेवन करे । यह रसोनपिण्ड वातरोग, अर्दित, अपतन्त्रक, एकाङ्गरोग, सर्वाङ्गरोग, उरुस्तम्भ, गृध्रसी, कृमिरोग, विशेषकर कमर व पीठकी पीडा और सब प्रकारके उदररोगोंको नष्ट करता है ॥५२-५५॥
त्रयोदशाङ्गगुग्गुलु ।
आभाऽश्वगन्धा हबुषा गुडूची शतावरी गोक्षुरवृद्धदारम् ।
रास्ना शताह्वा सशठी यमानी सनागरा चेति समैश्च चूर्णम् ॥
तुल्यं भवेत्कौशिकमत्र मध्ये देयं तथा सर्पिरथार्द्धभागम् ॥५६
आभा ( बबूरकी फली ), असगन्ध, हाऊबेर, गिलोय, शतावर, गोखुरू, विधा-रेके बीज, रायसन, सौंफ, कचूर, अजवायन और सोंठ, इन प्रत्येक औषधिका चूर्ण समान भाग और सम्पूर्ण चूर्णकी बराबर गूगल और गूगलसे आधा गौका घी लेकर सबको एकत्र उत्तम प्रकारसे खरल करके शुद्ध पात्रमें भरकर रखदेवे ॥
सार्द्धाक्षमात्रं तु ततः प्रयोगात्कृत्वाऽनुपानं सुरयाथ यूषैः ।
मद्येन वा कोष्णजलेन वाथ क्षीरेण वा मांसरसेन वापि ॥५७